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Saturday, June 14, 2014

प्रश्न? अब यक्ष प्रश्न है!....


प्रश्न
जो प्रेम से गुथे थे
इच्छाओं से वशीभूत थे
कल्पनाओं के घोड़ों पर सवार थे
रश्मि रथियों के साथ
सदियों की उत्कंठाओं
लालसाओं
से सुसज्जित
वो प्रश्न
जो थे आक्षेपित तुम पर
उपेक्षित कर दिए तुमने
लौटाया नहीं कुछ भी
प्रति उत्तर भी नहीं
उत्तर की अभिलाषा
सुदूर पूर्व से उगने वाले सूरज के साथ
उगती और सुदूर पश्चिम में नष्ट हो जाती
रोज दर रोज
मन की विकलता
अधीरता
और आक्रोश
आकाश में सूरज के चढ़ने और उतरने के साथ
पारे की तरह चढ़ती गिरती ह्रदय की गतियाँ
मनोदशाओं का ये जाल
झकझोर जाता
समय की रफ़्तार में
तुम्हे पाते खोते
एक नाविक की तरह
जल तरंगे ले जाती कही दूर
कही पास
मृगमरीचिका सा दृश्य है
प्रश्नों के उत्तर में
चलता हूँ कुछ कोस रोज चलता हूँ
सुदूर पूर्व में
नियति फिर धकेलती है उत्तर दक्षिण
सभी दिशाओं में
मन व्यग्रता की सीमाए तोड़ रहा है
ह्रदय अब नहीं होना चाहता कंपित वेग से
मष्तिष्क थक चूका है इस उधेड़बुन से
मन जो कभी नहीं रुकता?
ठहरना चाहता है
विश्राम की मुद्रा में खड़े मन को देखता हूँ
बरबस मुस्कान आ जाती है चेहरे पर
सोचता हूँ
मैं भी ठहर ही जाऊं
सब तो थक गए है
मन
मस्तिष्क
ह्रदय
हारे हुए से
मौन
चलो चले
अब उन परिचित पगडंडियों पर
जिन्हें बचपन से जानता हूँ
उन वनों में
बगीचों में
उन वृक्षों के पास
जो परिचित है मेरे
मेरे पूर्वजों के भी
सदियों से नाता है जिनसे
इस नए अनिश्चित गठबंधन ने
मोड़ दिया था पगडंडियों से दूर
बड़े रास्तों पर
जहाँ सब अपरिचित है सबके
अनजाने सफ़र की और
जहाँ संवेदनाओं की दुकाने भी नहीं
जो खरीद लेता...कुछ मोल भाव करके
जहां अनुराग आवश्यकता के रूप में है
जिसकी अदला बदली होती है
समय समय
अब प्रश्न
अनुत्तरित है
नियति अक्षम
प्रश्न?
अब यक्ष प्रश्न है!
कृष्ण कुमार मिश्र (13 जून 2014-लखीमपुर खीरी)