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Tuesday, June 17, 2014

दयार ए हिज्र में तक्सीम हम भी हो गए...



वादों के बोझ को उठाते है रोकर
झूठ के पुलन्दे को सर पर बिठाते है।

दयार ए गैर में मेहमां बने बैठे है वो
मगर अफ़सोस गफ़लत में दयार ए ग़म बनाते है?

हमें तो खौफ है उनके अहद की रोशनाई से
बनाकर घर फिर वो मकबरे की छत बनाते है

चलो उनके दयार ए गर्ब में देखें ज़रा
वो क्या छुपाते है? हमें और क्या बताते है।

दयार ए हिज्र में तक्सीम हम भी हो गए।
दयार ए हिन्द में अब हम फ़कत कुछ गीत गाते है।

दयार ए इश्क में दाखिल हुए थे सरफरोशी से
दयार ए ग़म में हम अब सभी से मुहं छुपाते हैं।

दयार ए हक़ में झूठे लोग बैठे थे।
दयार ए उम्र में अब खुद को हम कमजर्फ पाते है।

बुनियाद के पत्थर को मारते है ठोकर
ऊंची इमारत के आगे सर झुकाते है। 

कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"

Saturday, June 14, 2014

किसी को दर्द बांटना है यारों....


वफ़ा के मायने बदल गए यारो
दर्द अब शौक बन गए यारों

आरजुएं है सिर्फ कुछ पल की
इश्क अब खेल बन गए यारों

किसी को वक्त काटना है
किसी को दर्द बांटना है यारों

न रहनुमाई है न साफगोई है
लोग अब झूठ बन गए यारों

आदमी मिलकियत है हरम में उनके
रस्म ओ रिवाज़ अब खो गए यारों

चमन के फूल भी अब किराए के है
बीज माली भी अब गुजर गए यारों

ख्वाइशें भी खरीद लेते है लोग
कुछ झूठ कुछ फरेब से यारों।

किसे कहे मुस्तकिल है अपने वादों पर
यहाँ पल में दिल को बेंच लेते है यारों

गुजिस्ता दौर था जब किस्सा ए इश्क मौजू था
अब हर रोज फसानों के किरदार बदल जाते है यारों

मौसमी इश्क भी हो गया है अब
शहर बदले नए लोग मिल गए यारों

बड़ी बातें बड़े वादों का तरन्नुम है जुबा पर
फर्श पर आकर बदल गए है वो लोग यारों

इश्क के बाज़ार? में जाना मुनासिब है नहीं
यहाँ तलबगार नहीं सब खरीददार है यारों

कृष्ण कुमार मिश्र (सस्ती नज़्म)

जहां प्रेम के फल नहीं लगते!...


एक रोज कहा था मैंने
तुम्हें याद है?
उस प्रेम के दरख़्त के बावत
जब उसके फल पक जाए
तब आना तुम!
खिलाऊंगा वो प्रेम के फल
उसकी सुगंध सुवासित कर देगी मन को
और स्वाद तृप्त कर देगा क्षुधा को
क्षुधा जो सदियों से है
तुम्हारे मन में
जिससे विरक्त नहीं हो सकती तुम
कोई न हो सका
क्षुधा न हो
तो मनुष्य भी न पके फल की तरह
परिपक्वता की डोर है ये
और पकना तो पड़ाव मात्र है जीवन में
जीवन के एक पड़ाव को हासिल कर लेने जैसा
रिश्ते फल जीव
सभी को पकना है
यह उर्ध्वता है
अधोगति नहीं
किन्तु पकना है तुम्हें
हमें भी
पहुंचना है
उस छोर के अंत में
जहां आगे कुछ नहीं
इस पूर्णता में
समय की मर्यादा भी है
जिसे मानती है प्रकृति
हमें भी मानना होगा
पकने में समय की मर्यादा
परिक्वता को पाने की समय की मर्यादा
मर्यादा खंडित होगी
तो सडन हो जायेगी इस परिपक्वता में
सड़ना तो अंत का संकेत है।
अंत तो अंतहीन है
जो पूर्णता को
छिन्न करते हुए
ले जाएगा अनंत में
जहां अणु विखंडित हो जाते है
विखर जाते है विभिन्न रूपों में
जल में
वायु में
अग्नि में....
जहां विभेद असंभव
जोड़ना अकल्पनीय
एक जीवन की कथा
मुकम्मल होकर
बिखरने तक
अंतहीन राहों पर
जहां प्रेम के फल नहीं लगते!...

कृष्ण कुमार मिश्र

जहां बंटती है कामनाएं....


नेपथ्य से
उसे निहारना
स्नेहिल आँखों से
कामनाओं के तरकश से
तीरों को निकालना
फिर चढ़ा देना
प्रेम के धनुष पर....
अब वे स्वतंत्र है
हवा पर सवार
नुकीले तीर
प्रेम की अग्नि में बुझाए हुए
लालसाओं को लादे हुए
नेपथ्य से दूर
कमान के नियंत्रण से विमुख
हवा के झोकों के मध्य
लक्ष्य से अलाहिदा
भौतिकी के नियमों से परे
सवेंग आवॆग त्वरण से भिन्न
कर्म से भाग्य को चीरते हुए
सुदूर किसी अनजाने लक्ष्य को भेदते हुए
कामनाओं के तरकश से निकले ये बाण
इच्छित अनिच्छित को गौड़ कर देते है
नेपथ्य से निहारता है वो
ठगा हुआ सा
विद्या की निपुणता पर क्षोभ करता हुआ
लक्ष्य को भेद देने के टूटते अहम् को
भौतिकी के नियमों को
कर्मवाद के सिद्धांतों को
देखता है वो छिन्न भिन्न होते हुए
नेपथ्य से
सोचता है वो
नीयति को
ईश्वर को
संसार के नियमों से अलग
स्वयं को पाता है
नेपथ्य में
असहज और अप्रासंगिक
वह सोचता है
नेपथ्य से...
स्वयं को पाता है
आभासी नेपथ्य में
कल्पित मंच को
स्वप्निल कामनाओं को
आभासी तीरों को
झूठे धनुष को...
वह चलता है
बोझिल कदमों से
उस नेपथ्य की ओर..
जहाँ से संचालित होती है
कर्म और भाग्य की कहानियाँ
जहां बंटती है कामनाएं
सुदूर क्षितिज की ओर...
नेपथ्य से नेपथ्य में
विलीन होता हुआ...
सूर्य की तरह...
वह ....
नेपथ्य में...


कृष्ण कुमार मिश्र(25मई 2014)

उस चिड़िया के गीतों में...



वक्त के नसीब से
खुद को जोड़ता हुआ आदमी
तमन्नाओं का बोझ लिए फिरता है
आरजूएं थिरकती है उसके मन-आँगन में
ख्वाईशें पनपती है उसके ह्रदय में
उगते है तमाम बीज ख़्वाबों के?
बिना खाद के बगैर पानी के
वह सींचता है उन ख़्वाबों को सिर्फ मन की मुरादों से
कही ख़्वाब उगते है क्या
लेते है शक्ल क्या ऊँचे दरख़्त की
और क्या लगते है डालियों में फल
और अगर ऐसा होता है
तो जरूर चहचहाती होगी तमाम चिड़ियाँ
उस दरख़्त की डालियों पर
पर ख़्वाब तो ख़्वाब है
वो उगते भी है
दरख़्त भी बनते है
पर उन्हें सींचना होगा
पसीने से
देनी होगी म्हणत की खाद
सिर्फ परिकल्पनाओं से नहीं
न ही मुरादों से
कर्म की उंगली पकड़
अब बढेगा ये दरख़्त
और बनेगा
इक घोसला
उस चिड़िया का
जो सदियों से नीड़ की आस में है
फिर तब वक्त का नसीब
घुल जाएगा
उस चिड़िया के गीतों में

कृष्ण कुमार मिश्र(23/24 मई 2014)

जिसकी मूल है अद्वैत में...



।।नई कविता।।
प्रेम पावक है
शीतल भी
रौद्र है
सुन्दर भी
अनंत है
समीप भी
कितने रूपों से गढ़ा है ये भाव
प्रेम
सभी रसों से
सभी भावों से
शास्त्रों से
संगीत से
युद्ध से
मित्रता से
सना हुआ है
प्रेम
वीभत्स भी है
कोमल भी
कलुषित भी है
और गर्वित भी
बोध में अबोध भी
किञ्चित में अन्किचित भी
जड़ से चेतन तक
प्रेम ही प्रवाहित है
अंत से अनंत तक
इंसान से भगवान् तक
कैसे करू परिभाषित
इस तत्व को
जो बिखरा है
द्वैत से अद्वैत तक
सोचता हूँ
स्वयं को
भूलूँ
उसे स्मरण करूँ
जो अनादि है
अनंत है
अद्वैत है
जहाँ से फूटती है धार
इस रस की
जो जन्मा है द्वैत में
जिसकी मूल है अद्वैत में
जो निरंतर है
सृष्टि में
शिव है
सुन्दर है
और सत्य भी
प्रेम
कृष्ण कुमार मिश्र (21 मई 2014)

ऐसा होता तो कृष्ण भी न रोता....

तुम मिली तो लगा 
खुद से रूबरू हुआ हूँ।
तुम बोली तो लगा
 अपने ही अल्फाजों से बावस्ता हुआ हूँ
तुम्हारे हर अंदाज़ में कुछ मेरा
 कुछ खोया सा वापस मिला है
वैसे तो ये एहसास है
बड़े नाकिश है
कुछ भी बुन लेते है 
दिमागों की डलिया में दिल की धुनक से!
दर्द के कटोरे में प्रेम की डली से
मिठास कायम रखते हुए
ये एहसास ...
खारे पानी की बूंदों को ढुलका देते है
जमीनों पर
ये बूँदे अंकुरित नहीं कर सकती बीज
हाँ विध्वंश अवश्य कर सकती है
अंकुरित होती नवीनता को
अपनी क्षारीयता से?
एहसास तो एहसास है
टिकना इनकी सिफत कहाँ?
कभी चेहरों को खिलाते
कभी मायूस कर देते
हर पल खेलते है ये
हर परिस्थिति में
बिना ठहरे हुए
मानव वृत्तियों को
उकेरते चेहरों की किताबों पर
बहुत कुछ लिखते
और मिटा देते
एक पल में
इस अस्थिरता को बाँध सका है
कोइ?
एहसासों की लगाम कस सका है कोइ?
काश ऐसा होता
मन स्थिर हो जाता
दिमाग चलता अपनी गणित के नियमो से
वेग उद्वेग क्रोध आक्रोश 
उत्कंठा प्रेम अधीरता और लालसाएं
ख़त्म हो जाती
फिर कुछ भी न हर पल लिखा जाता
न मिटाया
चेहरों के पन्ने कोरे होते...
एहसास बड़े नाकिश है....
ये सच है
नहीं बख्सते किसी को
ऐसा होता तो कृष्ण भी न रोता
गांधारी के आगे
उस श्राप के परिणाम के एहसास से
मन को गिरफ्त में करने वाला
मन की उपज को नहीं कर सका नष्ट
वृत्ति तो वृत्ति है
आदमी नहीं रोक सकता इसे
वेद से
शास्त्रों से
योग से
कदापि नहीं

कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"

लम्स हाथों का मेरे याद तो आता होगा...


सियासत आज फिर से मायके में रो रही है।
कि बाज़ी किस जुवारी के घर ले जाएगी उसको। 

आरजू तुमसे कोई ख़ास नहीं खुद से शिकायत है मुझको।
बस मेरे दर्द के घर में कुछ उम्दा पैबंद लगा दो तुम।

तुम्हे भूला नही अब तक वजह बस बाखुदी की है।
खुद को भुलाने से तुम्हे तो याद रखना ही अच्छा है।

चलो चलते है बहारों के उस खूबसूरत घर में
जहाँ के दरीचे तुम्हे दुनिया की असलियत को दिखलायेंगे।
 

तुम थी तो सभी फूलों के रंग बड़े चटक हुआ करते थे।
जिनकी सीरत में न था महकना वो भी महका करते थे।
 

तुमने इंकार किया तो रात के पहलू में आ गया।
ग़र तुम अब मिली भी तो ये रात से बेवफाई होगी।
 

उसके नीलस्याही ख़याल ने मुझे इतना मशरूफ कर दिया।
मैं मैं न रहा वो वो न रही बस अहद में इक अक्स रह गया।
 

ये कुदरत है खिला कर फिर जमीदोज़ कर देगी।
नए अक्सों नए रंगों में तुमको फिर से गढ़ देगी।
 

चटकना है तो बिखरना लाजमी है।
फिज़ा में फिर से खिलना मौसमी है। 

ताल्लुक चटक जाए तो समझो वक्त पूरा हो चुका है।
कुदरत भी तो फल को चटकाती है पक जाने के बाद! 

ये तेरी मोहब्बत का रक्स है या मेरी दीवानगी का।
फ़ितना ए हश्र मालूम था फिर भी डूबते गए।
 
 
 

तुमसे मुतालिक सोचता हूँ तो तुम मैं होती हो।
अब बताओ तुम्हे भूलूँ या खुद को याद करूँ।
 

मेरे इश्क का नसीब बड़ा ही मुस्तकिल था।
हज़ार कोशिशे भी रुख़ न बदल सकी।
 

हमीं सद्रे ए इल्म हमीं हाकिम अदब के है
मगर कमजर्फ हमको आँकता खुद की नज़र से है।

बड़े बेमुरब्बत है बड़े शहरों के वे लोग।
मोहब्बत को फ़कत वे तमाशा ही समझते है।

उसी ने इश्क के परचम पे मेरा नाम लिक्खा था।
उसी ने परचम को कफ़न में तब्दील कर डाला।

लम्स हाथों का मेरे याद तो आता होगा।
आइना जब भी तुम्हे तुम को दिखाता होगा।

सपनों की बुनियाद पर रखी थी नीवं हमने।
इमारत क्या कभी ख़्वाबों पे टिकती है। 

इश्क की दुश्वारियों का क्या कहे कृष्ण।
लम्हा लम्हा आँखों में समंदर घुमड़ जाते है।

बड़ा ही मुतमईन था उसके अहद से।
मगर इश्क में कोइ अहद टिकता कहाँ है।

मुझे मालूम था मोहब्बत की सिफ़त तो इंकलाबी है।
मगर उसने मोहब्बत की तो सीरत ही बदल डाली।

उनका आना जाना मेरे दयार में हवादिसों की मौजें थी।
कभी बर्क ए हावादिस तो कभी कोह ए हवादिस थी। 

दयार ए हिज्र में हूँ ये गुमराह तमन्नाओं का सिला है।
दयार ए गैर में जो गए थे इश्क की फ़रियाद लेकर।

इस कमजर्फ आरजू के खातिर जुस्तजू की हमने
उनकी कवायद फकत दिल को बहलाने की थी।
 

अहद ए इश्क में कितने फ़साने गढ़ गए।
अहद ए हाल में अब कुछ समझ आता नहीं।

अहद-शिकन का अंदाजा नहीं था उससे ।कृष्ण।
वरना हम तोड़ने वालों से नाता कम बनाते हैं।

बड़े बेखौफ थे हम इश्क की कारस्तानियों से।
वाकिफ हुए तो हर चीज़ से खौफ़जदा हूँ अब।

तेरे रुखसार पे मेरे हाथों का सरकना।
हथेली पर तेरे चेहरे की छाप दे गया।
 
 
 
 
  

कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"         

 

Sunday, April 13, 2014

चलो छोड़ो अब इस झूठ के ताल्लुक को ही जारी रखिए...




इस मखमली गुलाब को जब हरियाली के दरीचे से झांकते देखा.
ला मुहाला उस नाज़मीन का चेहरा मेरे तसव्वुर में आ गया. 


हमारे नसीब में अश्कों की इक लम्बी दास्ताँ है।
आज सपने में मिले भी तो रोये बहुत थे हम।


इमारत बन नहीं पाई इबारत लिख गयी पहले।
यही बाकी निशाँ है आज कल के शाहजहाँओ का। 


जिन्हें मालूम नहीं रंगों की तासीर।
वे हाथों में कुछ बेजान से रंग लिए फिरते हैं।


रंग तो आफताब से है जिनकी एहसासों से शनासाई है।
संग ए दिल को खबर ही क्या की रंगों की बहार आई है।


तुम रोये तो मैं समंदर हो ग़या तुम हँसे तो मैं सीप बन गया।
फर्क अश्क ने बयाँ किया कभी खारी बूँद तो कभी गुहर हो गया।


बड़े फ़क्र से सब सालिम कहा करते थे मुझे।
लौटा जब तेरे पास से तो टुकड़ों में वजूद था मेरा।


ख़्वाबों का क्या वो तो कुछ भी देख लेते है।
कभी खुशी तो कभी दर्द के संग हो लेते है। 


जुदा होने की रस्मों के उस बेदर्द मंजर ने तड़पाया बहुत था।
आज सपने में मिले उससे तो खौफ ए जुदाई ने रुलाया बहुत था।


झूठ की आड़ में कितने गढ़े किस्से तुमने।
चलो छोड़ो अब इस झूठ के ताल्लुक को ही जारी रखिए।


नस्ल दागी है जहन पाक नहीं तो कोई बात नहीं।
सिलसिला फ़रेब ए मोहब्बत का तो ज़ारी रखिए।


कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"

Monday, March 3, 2014

कि मक्का और काशी भी एक हो जाए




नियत पाक और खुदा की नियामत हो जाए।

सारी कायनात में तेरी आरजुओं के दरीचे खुल जाए। 


सोचता हूँ अब उसकी बन्दिगी की जाए।

शायद मेरी भी एड़िया इस्माइल (अलै.) सी एड़िया हो जाए। 



जहां रख दूं पाँव जमीं के दामन पर।
वही से आब ए जमजम की धार छुट जाए।  



वो चाहेगा तो ख़त्म कर देगा सारे दरमियाँ
कि मक्का और काशी भी एक हो जाए।  



अभी वक्त है इंतज़ार करो कुफ्र वालो बस क़यामत तक।
देखिएगा उस ऱोज मोहम्मद भी राम हो जाए।  

अभी वक्त है कायनात के कफ़स में काफिरों का।
वक्त आने दो तब उनका भी हिसाब हो जाए।


कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"

वो इलेक्ट्रानिक दरीचों से झांकती है मुझे हरदम।




तुम्हे तो खुद पे एतबार नहीं मेरे वजूद पर सवाल करते हो 
ज़रा देखों मेरी जानिब तुम तो मुझसे ही प्यार करते हो.



समझ में क्यों नहीं आता हमारे वजूद पर कीचड उछालने वालों 
हम फलक के चाँद है अंधेरों में रोशन जहां को करते हैं.



दिल में साफगोई न हो तो इश्क की बात मत करिए 
फरेब से किसी को अपना बनाने की बात मत करिए .



चलो मिलने मिलाने की ये कवायद ख़त्म करते हैं.
बहुत हुआ मोहब्बतों का ये खेल इसे अब बंद करते हैं .



वो इलेक्ट्रानिक दरीचों से झांकती है मुझे हरदम।
मेरी जिद है की वो अपने घर की खिड़की में नज़र आये.



हमें मालूम न था की अल्लाह ने कुछ रूहानी सिफ़त दी है मुझे।
जहन को मेरे आब ए जमजम सी सिफ़त दी है मुझे। 

बस रूह मेरी अब तिलमिला उठी है कुफ्र वालों से।
जो भी आता है पाक होता है और अपने मैल छोड़ जाता है।



मैं रफ्ता रफ्ता उसी का हो रहा था।
मगर वो अपने कुफ्र मुझमें धो रहा था।



किसी की चाह में खुद को भुला देने की नीयत आसमानी हो गयी है 
इश्क में ताज बना देने की वह कहानी अब पुरानी हो गयी है .



तू याद आती है तो कुछ पुराने गीत याद आते है। 
जो गुनगुनाएं थे कभी जब हम साथ साथ थे।



उसकी याद ने जब जब जहन में अंगड़ाई ली।
मेरे चश्म ए तर में तब तब आंसुओं ने डेरा डाला। 



कृष्ण खुश होने के लिए ख़्वाब का सब्ज़ बाग़ अच्छा है.
किसी को खोकर किसी को पाने का यह ख़याल अच्छा है.



कहानी रुख बदलती है तो दिलों को दूर करती है।
नदी जब रुख बदलती है तो जमीं तक्सीम करती है। कृष्ण 

नहीं समझे अगर अब भी तुम अफसानों के नकली ढंग
तो मत कहना की मंजिल दूर है अब दम निकलती है।



मौका परस्ती हमने भी सीख ली तुम्हारे साथ रह कर।
वरना हम किसी हाल में हो गुजारिश नहीं करते थे कभी। 



बेवजह मुस्कारने की बात पूँछी थी। 
दिल लगाने के सबब में जवाब मौंजू है।



वो जरूर फर्क समझ जाते नफ़रत और मोहब्बत में।
अगर उन्होंने दिल दिमाग के फासले की पैमाइश की होती।



दर्द में मुस्कारने की अदा हर किसी को नहीं आती।
जो मिटा नहीं किसी पे उसे बेवजह मुस्कारने की अदा नहीं आती।



जिन्हें इश्क की सिफत नहीं मालूम 
वो बेवजह मुस्कारने का सबब पूंछते है।



इश्क के गुजिस्ता दौर में जब कहानी ने रूख बदला। 
तभी से हमको बेवजह मुस्कारने की आदत सी हो गयी। 


कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"





बड़ी अजीब है लोगो की फितरत यहाँ कृष्ण 
चोट किसी और से खाते हैं देते किसी और को हैं.

........................................... 

ज्ञान की उन्नति के साथ परिभाषाये भी बदलती है पर बिना पहली वाली परिभाषा के दूसरी परिभाषा कैसे संभव। कृष्ण

वक्त तो स्थिर है वत्स वो न आता है न जाता है बस जरूरत है वक्त को तुम अपना कब बना पाते हो। कृष्ण

Wednesday, February 26, 2014

तब से आँख ने खारे पानी के समन्दर की शक्ल ले ली।



बहुत अज़ीज़ थे तुम मेरे हबीब थे तुम 
दौर गुजरा तो तुमने दुश्मनी का रिश्ता भी न मुनासिब समझा



फिर न कहना की देश की हालत खराब है 
तुमने जो महज़ कुछ सिक्कों के लिए बेखुदी चुन ली



आरजुएं भटकती है मुर्दों के आस पास 
तमन्नाओं ने ज़िंदा लोगों को ज़िंदगी दी है



इश्क अब पुराने दिनों की बात है कृष्ण 
जिस्म के बाजार ने जज्बातों की तहोबाला कर दी



इश्क के बाज़ार में हम रोज़ सैर करते है 
बड़े करीने से लोग कहते है की हम सिर्फ तुमसे प्यार करते है.



तू न होती तो ये किस्से तमाम न होते 
तेरे बगैर इश्क के हम इल्मदार न होते .



यहाँ ताल्लुक के लिए भी व्यापार होता है।
हमें इल्म न था हम तो जमीनों में जिंदगियां उगाते हैं।



तेरी याद में जो बोये थे बीज हमने।
वो दरख़्त बनकर नए बीज देने लगे हैं। 



तेरे भी अश्क गिरे थे मेरे अश्कों के साथ साथ।
चलो चले उस जगह पर इक पेड़ लगाया जाए।



चलो चले उस दश्त के शहर कुछ खोजा जाए।
कहीं तो सहरा की रेत आज भी मेरे आंसुओं से नम होगी। 



कुछ लोग बड़े अजीब होते है।
होते रकीब है पर दिखने में अजीज होते है।



तुझसे मुसलसल ताल्लुक की तमन्ना ही रह गयी।
तुम्हे तो फकत कुछ ख्वाईशों को उरूज़ देना था। 



वो लम्हात कई सदियों का इंतज़ार लगते थे।
पर तेरे आने की आस में वक्त सरकता बड़े मज़े से था।



जब से मुस्कराने के सबब छीन लिए उसने।
तब से आँख ने खारे पानी के समन्दर की शक्ल ले ली।



इश्क तो लम्हात की कहानी है।
तमाम मसायल में सारी उम्र को गर्त होना ही था। 



उसने देखकर मेरी जानिब सिहर कर नज़र फेर ली थी।
मेरी आँखों में जो प्यार की सुनामी उमड़ रही थी। 



तेरे जाने के बाद हमें साये भी डराने लगे 
तू साथ थी तो परछाईयों का ख़याल किसे था.



उस यकीन के टूटने की चटक यूं जज्ब हो गयी जहन में 
अब तो हर एक आहट पे खौफ खाता हूँ .



उसे खोजा हर तरफ उस नकाबपोशों के शहर में 
दश्त में जिधर देखता था वही नज़र आती थी 



दिले मासूम का इरादा तो नेक था 
हज़ार राह में आये पर नज़र में वही एक था



खौफ खूबसूरत होने का है या दिल में कोई मलाल है 
लोग चेहरों पर मुख्तलिफ चेहरे लिए फिरते है



गुज़री हुई चीजों से एहतराम क्या करना।
जो खो गया हो उसका इंतज़ार क्या करना।



तेरी आस में तेरे सहरा में भटका हूँ पागलों की तरह।
सोचा था की आँचल से पोछेगी तू पसीना मेरे माथे का । 


कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"

रिश्तों की अवधारणा के पीछे सबसे बड़ी वजह रही होगी स्त्री पुरूष के संबंधों के बीच मर्यादा की स्थापना।।। नहीं तो समाज की परिकल्पना ही असंभव होती। कृष्ण



























Sunday, February 23, 2014

तुम हमारे बगैर दिवाली की राह तकते हो।



कुछ शेर जो ग़ज़ल के टुकड़ों की मानिंद पेश ए खिदमत है। सभी मोहतरम और मोहतरमा हौसला अफजाई जरूर करे ताकि ये टुकड़े मुकम्मल ग़ज़लों में तब्दील हो सके।


हम मुस्तकिल है ऊंचे दरख्तों की तरह जिनकी जड़े धरती को जकड़ लाती है। 
जिन्हें टिकना नहीं है इक मुकाम पर उनकी जड़े गमलों में कसमसाती है।

अब तो लोग दरख्तों को गुलामी दे रहे है
पीपल बरगद को तसले में कैद कर रहे है।


वो लोग जो खुद को बड़ा कहते रहे।
करीब गया तो वहां बोसनाई मिली।


चोट कैसी भी हो जब दर्द भी घबरा जाए
इश्क ऐसा हो की पत्थर में भी घाव कर जाए।


इश्क के खेल में कुछ भी मुस्तकिल नहीं होता।
कभी दिल चटकता है तो कभी नसीब फूटता है।


और भी चेहरे है जनाब के।
ज़रा हिजाब तो उठाओ यारो। 


आप को रखना नहीं मुझसे वास्ता कोई तो कोई बात नहीं।
तामाम कुफ्र दिल में रहते है तो मोहब्बत की कोई बात नहीं।


तुझे देता हूँ दरिया सी रवानी समंदर सी गहराई 
फिर न कहना की तुम उथले थे सो बहते चले गए..

 (बड़ा विरोधाभाषी ख़याल है..किन्तु पूरक है एक दूसरे से ...समझिएगा संभल कर ...)


हमारे इश्क की वो कहानी जो वही पर रह गयी थी 
बचा था जो उसे दरिया समंदर के हवाले कर रही है 


कहाँ मिटता है कुछ भी जो लिखा तुमने मोहब्बत में 
पेड़ पौधे हवा पानी सभी वो गुनगुनाते है


घर की चौकठ का भी सज़दा करते है हम 
उन्हें! मालूम ही क्या खुदा रहता कहाँ है .


बलंदी आजकल सस्ते दामों में मिलती है 
मगर इस शर्त पर की वो बे बुनियाद होगी.


चलो बुनियाद के पत्थर को सलाम कर लिया जाए
इमारत ढह गयी है मलबे की ईंट को मंदिर में रख लिया जाए


गुजिस्ता दौर के किस्से अजीब थे
अब जो रकीब है तब वो हबीब थे ! 


अब्र के टुकड़ों को चांदी समझ बैठे है लोग 
कुछ जोकरों को गांधी समझ बैठे है लोग ..


तू रोया तो अब्र रोया 
बूँद में बस फर्क खारेपन का था 


एखलाक की उम्मीद में उम्र गुज़र गयी
बाजारू मोहब्बत में हम बिकते चले गए.


बड़े बेमुरब्बत है लोग यहाँ
बिना जरूरत के पहचानते नहीं


मोहब्बत क्या है मुझे इल्म नहीं
बस तेरे होने की शिनाख्त है मुझको .


मुझे नहीं मालूम इश्क क्या है 
मेरा तो सिर्फ तुझसे वास्ता था


अल्फाज़ वो जरिया है जो एहसासों को वजूद देते है 
तुमने झूठे एहसासों के लिए अल्फाजों की बेइज्जती की है.

दूरियां थी मगर हम दूर न थे तब तक 
जब तक तूने मुझसे बेईमानी न की

किसी ने फायदे के सिवा कुछ भी नहीं चाहा 
एक हम थे जो जानकार भी ठगते रहे .

ज़िंदगी में दौर ए सिलसिला इस तरह आया 
लोग बस फ़ायदा उठाते चले गए 

तेरी बेवफाई का सबब पता है मुझको।
फिर क्यों तुम खुद को कोसती हो।

तेरे न होने का कोंई सवाल नहीं।
तुम तो मेरी ही इबारत हो।

चाँद के बगैर शबनम रौशन नहीं होती।
तुम हमारे बगैर दीवाली की राह तकते हो।

शेर के अक्स में भेडिये घुस तो आये है।
पंजों के निशानों ने जमीं को इत्तला कर दी।

वक्त की सिफ़त है गुज़र जाना
इश्क में रूकने की हिदायत है।

इश्क लम्हों में गिना जाता है।
तुम वर्षों की बात करते हो।

नस्ल की बुनियादी समझ जरूरी है।
हरामखोरों की तस्दीक भी जरूरी है।

कुछ बेवजूद बेमुरब्बत कुफ्र वालों से वास्ता हो गया मेरा।
खुद को तौला तो खुद ही पे शर्मसार हुआ।

बसंत फिर आकर चला गया 
तेरा ऋतुओं से भी वास्ता है !

वो लोग जो इश्क में रस्म ए रवादारी की बात करते है।
जो मोहब्बत की इब्तिदाई किताब को रद्दी की दुकाँ पे बेंच आये है। 

उन्होंने होश ओ हवास में मेरी मोहब्बत की तहोबाला कर दी।
हम होश खो कर भी इश्क की हर रस्म निभाते चले गए। 

इतनी मिलती है उस चिड़िया से सीरत उसकी।
जब भी मिलती है तो चोच लड़ाती है वो। 

तुझे पाना जो मेरा नसीब था

तेरा हिज्र भी तो अजीज है।

तू नहीं है जो मेरी हयात में
फिर भी तू दिल के करीब है

हर कहानी का सबब होता कहाँ है खुशनुमा।
एक दिन हम भी हँसे थे पहली दफा जब तुम मिली थी।

आँख में रहती नमीं थी जब हम दोनों साथ थे।
कम से कम अश्कों को अब थोड़ी मोहलत तो मिली है।

गम जुदाई का नहीं अब सालता होगा तुम्हें
रिश्ते दरकने से हमें बदले में ये राहत तो मिली है।

रात दिन की वो तड़प मिलना तेरा फिर दूर हो जाना।
मेरी जाँ चलो छोड़ों दिलों जाँ को अब फुर्सत तो मिली है।


भूख से बेहाल बच्चों की जरूरत है फकत कुछ रोटियाँ
इल्मदारी चुटकले और खिलौने ये सभी बेकार है।


पेट भूखा मगज़ सूखा ये हालात है हिन्दूस्तान के।
आप कहते हो की हम कायदे आज़म है इस कायनात के।


तेरा करम हुआ तो तुझे तेरी कसम दुनिया को बनाने वाले 
तेरी कायनात की खिदमत में इक दिन बड़ा नाम करूंगा.


मुद्दतें गुजर गयी उससे रूबरू हुए ।
मगर ख़्वाबों में हर ऱोज मिला करता हूँ।


मुसलसल चाह में तेरी दरिया सी रवानी है।
फकत बस चंद बांधों ने तेरी रफ़्तार कम की है।


प्रेम की कोई मुक़र्रर तारीख नहीं होती।
महसूस करो ये तो लम्हों का मामला है।


मोहब्बत दिलों में नहीं अब बाज़ार की चीज हो गयी।
इस मुसलसल ज़ज्बात की भी इक तारीख हो गयी।


मुस्तकिल रिश्तों की अब बुनियाद खो गयी।
इश्क की भी मुक़र्रर इक तारीख हो गयी।


दर ओ दीवार में उग आये है मुख्तलिफ़ दरख्त।
हम तो वीराने में है मगर चिड़ियों ने गुलज़ार कर रखा है घर।



कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"