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Tuesday, June 17, 2014

दयार ए हिज्र में तक्सीम हम भी हो गए...



वादों के बोझ को उठाते है रोकर
झूठ के पुलन्दे को सर पर बिठाते है।

दयार ए गैर में मेहमां बने बैठे है वो
मगर अफ़सोस गफ़लत में दयार ए ग़म बनाते है?

हमें तो खौफ है उनके अहद की रोशनाई से
बनाकर घर फिर वो मकबरे की छत बनाते है

चलो उनके दयार ए गर्ब में देखें ज़रा
वो क्या छुपाते है? हमें और क्या बताते है।

दयार ए हिज्र में तक्सीम हम भी हो गए।
दयार ए हिन्द में अब हम फ़कत कुछ गीत गाते है।

दयार ए इश्क में दाखिल हुए थे सरफरोशी से
दयार ए ग़म में हम अब सभी से मुहं छुपाते हैं।

दयार ए हक़ में झूठे लोग बैठे थे।
दयार ए उम्र में अब खुद को हम कमजर्फ पाते है।

बुनियाद के पत्थर को मारते है ठोकर
ऊंची इमारत के आगे सर झुकाते है। 

कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"

Saturday, June 14, 2014

किसी को दर्द बांटना है यारों....


वफ़ा के मायने बदल गए यारो
दर्द अब शौक बन गए यारों

आरजुएं है सिर्फ कुछ पल की
इश्क अब खेल बन गए यारों

किसी को वक्त काटना है
किसी को दर्द बांटना है यारों

न रहनुमाई है न साफगोई है
लोग अब झूठ बन गए यारों

आदमी मिलकियत है हरम में उनके
रस्म ओ रिवाज़ अब खो गए यारों

चमन के फूल भी अब किराए के है
बीज माली भी अब गुजर गए यारों

ख्वाइशें भी खरीद लेते है लोग
कुछ झूठ कुछ फरेब से यारों।

किसे कहे मुस्तकिल है अपने वादों पर
यहाँ पल में दिल को बेंच लेते है यारों

गुजिस्ता दौर था जब किस्सा ए इश्क मौजू था
अब हर रोज फसानों के किरदार बदल जाते है यारों

मौसमी इश्क भी हो गया है अब
शहर बदले नए लोग मिल गए यारों

बड़ी बातें बड़े वादों का तरन्नुम है जुबा पर
फर्श पर आकर बदल गए है वो लोग यारों

इश्क के बाज़ार? में जाना मुनासिब है नहीं
यहाँ तलबगार नहीं सब खरीददार है यारों

कृष्ण कुमार मिश्र (सस्ती नज़्म)

प्रश्न? अब यक्ष प्रश्न है!....


प्रश्न
जो प्रेम से गुथे थे
इच्छाओं से वशीभूत थे
कल्पनाओं के घोड़ों पर सवार थे
रश्मि रथियों के साथ
सदियों की उत्कंठाओं
लालसाओं
से सुसज्जित
वो प्रश्न
जो थे आक्षेपित तुम पर
उपेक्षित कर दिए तुमने
लौटाया नहीं कुछ भी
प्रति उत्तर भी नहीं
उत्तर की अभिलाषा
सुदूर पूर्व से उगने वाले सूरज के साथ
उगती और सुदूर पश्चिम में नष्ट हो जाती
रोज दर रोज
मन की विकलता
अधीरता
और आक्रोश
आकाश में सूरज के चढ़ने और उतरने के साथ
पारे की तरह चढ़ती गिरती ह्रदय की गतियाँ
मनोदशाओं का ये जाल
झकझोर जाता
समय की रफ़्तार में
तुम्हे पाते खोते
एक नाविक की तरह
जल तरंगे ले जाती कही दूर
कही पास
मृगमरीचिका सा दृश्य है
प्रश्नों के उत्तर में
चलता हूँ कुछ कोस रोज चलता हूँ
सुदूर पूर्व में
नियति फिर धकेलती है उत्तर दक्षिण
सभी दिशाओं में
मन व्यग्रता की सीमाए तोड़ रहा है
ह्रदय अब नहीं होना चाहता कंपित वेग से
मष्तिष्क थक चूका है इस उधेड़बुन से
मन जो कभी नहीं रुकता?
ठहरना चाहता है
विश्राम की मुद्रा में खड़े मन को देखता हूँ
बरबस मुस्कान आ जाती है चेहरे पर
सोचता हूँ
मैं भी ठहर ही जाऊं
सब तो थक गए है
मन
मस्तिष्क
ह्रदय
हारे हुए से
मौन
चलो चले
अब उन परिचित पगडंडियों पर
जिन्हें बचपन से जानता हूँ
उन वनों में
बगीचों में
उन वृक्षों के पास
जो परिचित है मेरे
मेरे पूर्वजों के भी
सदियों से नाता है जिनसे
इस नए अनिश्चित गठबंधन ने
मोड़ दिया था पगडंडियों से दूर
बड़े रास्तों पर
जहाँ सब अपरिचित है सबके
अनजाने सफ़र की और
जहाँ संवेदनाओं की दुकाने भी नहीं
जो खरीद लेता...कुछ मोल भाव करके
जहां अनुराग आवश्यकता के रूप में है
जिसकी अदला बदली होती है
समय समय
अब प्रश्न
अनुत्तरित है
नियति अक्षम
प्रश्न?
अब यक्ष प्रश्न है!
कृष्ण कुमार मिश्र (13 जून 2014-लखीमपुर खीरी)

जो ईश्वर की प्रतिलिपि थे...



आज कुछ लोग मिले थे
अतीत के साक्षी
छेड़ दिए तार जिनने उनके
जो खो गए हैं
कही दूर
सपनों की तरह
जिनकी बाहों में खेला
जिनकी छाव में पला
जिनकी नजरों में रहा
पालन हारे थे जो
जिनसे सीखा
दुनिया के ये दस्तूर
जो ईश्वर की प्रतिलिपि थे
आज खोजता हूँ
उन्हें क्षितिज के उस पार
अपने आस पास
अतीत में
अपने बचपन में
पर अब नहीं मिलते वो कही
आँखे बरस जाती है
बार बार
ह्रदय कम्पित होता द्रुतगति से
छाती फटती सी है
बस वो चेहरे
धूमिल से नजर आते है
कुहासे के बीच
सूरज की किरने
उड़ा ले जाती है उन्हें कुहासे के साथ
अनंत में कही दूर
पर यादें है आती है
बार बार
मन में घुमड़ते है चक्रवात
तड़प की पराकाष्टा
बोध विवेक और ज्ञान
सब शून्य होते है
बचता है तो केवल अतीत
जो खो चुका
पर साथ साथ है
अंत तक
स्वयं के निर्वाण तक
अतीत की ये दुःख भरी मिठास
चलती है नेपथ्य में
वेदना की पीठ पर
पीड़ा के भीतर
अंतिम पड़ाव तक
मनुष्य के गंतव्य में
कथित मोक्ष तक।

कृष्ण कुमार मिश्र

जहां प्रेम के फल नहीं लगते!...


एक रोज कहा था मैंने
तुम्हें याद है?
उस प्रेम के दरख़्त के बावत
जब उसके फल पक जाए
तब आना तुम!
खिलाऊंगा वो प्रेम के फल
उसकी सुगंध सुवासित कर देगी मन को
और स्वाद तृप्त कर देगा क्षुधा को
क्षुधा जो सदियों से है
तुम्हारे मन में
जिससे विरक्त नहीं हो सकती तुम
कोई न हो सका
क्षुधा न हो
तो मनुष्य भी न पके फल की तरह
परिपक्वता की डोर है ये
और पकना तो पड़ाव मात्र है जीवन में
जीवन के एक पड़ाव को हासिल कर लेने जैसा
रिश्ते फल जीव
सभी को पकना है
यह उर्ध्वता है
अधोगति नहीं
किन्तु पकना है तुम्हें
हमें भी
पहुंचना है
उस छोर के अंत में
जहां आगे कुछ नहीं
इस पूर्णता में
समय की मर्यादा भी है
जिसे मानती है प्रकृति
हमें भी मानना होगा
पकने में समय की मर्यादा
परिक्वता को पाने की समय की मर्यादा
मर्यादा खंडित होगी
तो सडन हो जायेगी इस परिपक्वता में
सड़ना तो अंत का संकेत है।
अंत तो अंतहीन है
जो पूर्णता को
छिन्न करते हुए
ले जाएगा अनंत में
जहां अणु विखंडित हो जाते है
विखर जाते है विभिन्न रूपों में
जल में
वायु में
अग्नि में....
जहां विभेद असंभव
जोड़ना अकल्पनीय
एक जीवन की कथा
मुकम्मल होकर
बिखरने तक
अंतहीन राहों पर
जहां प्रेम के फल नहीं लगते!...

कृष्ण कुमार मिश्र

जहां बंटती है कामनाएं....


नेपथ्य से
उसे निहारना
स्नेहिल आँखों से
कामनाओं के तरकश से
तीरों को निकालना
फिर चढ़ा देना
प्रेम के धनुष पर....
अब वे स्वतंत्र है
हवा पर सवार
नुकीले तीर
प्रेम की अग्नि में बुझाए हुए
लालसाओं को लादे हुए
नेपथ्य से दूर
कमान के नियंत्रण से विमुख
हवा के झोकों के मध्य
लक्ष्य से अलाहिदा
भौतिकी के नियमों से परे
सवेंग आवॆग त्वरण से भिन्न
कर्म से भाग्य को चीरते हुए
सुदूर किसी अनजाने लक्ष्य को भेदते हुए
कामनाओं के तरकश से निकले ये बाण
इच्छित अनिच्छित को गौड़ कर देते है
नेपथ्य से निहारता है वो
ठगा हुआ सा
विद्या की निपुणता पर क्षोभ करता हुआ
लक्ष्य को भेद देने के टूटते अहम् को
भौतिकी के नियमों को
कर्मवाद के सिद्धांतों को
देखता है वो छिन्न भिन्न होते हुए
नेपथ्य से
सोचता है वो
नीयति को
ईश्वर को
संसार के नियमों से अलग
स्वयं को पाता है
नेपथ्य में
असहज और अप्रासंगिक
वह सोचता है
नेपथ्य से...
स्वयं को पाता है
आभासी नेपथ्य में
कल्पित मंच को
स्वप्निल कामनाओं को
आभासी तीरों को
झूठे धनुष को...
वह चलता है
बोझिल कदमों से
उस नेपथ्य की ओर..
जहाँ से संचालित होती है
कर्म और भाग्य की कहानियाँ
जहां बंटती है कामनाएं
सुदूर क्षितिज की ओर...
नेपथ्य से नेपथ्य में
विलीन होता हुआ...
सूर्य की तरह...
वह ....
नेपथ्य में...


कृष्ण कुमार मिश्र(25मई 2014)

उस चिड़िया के गीतों में...



वक्त के नसीब से
खुद को जोड़ता हुआ आदमी
तमन्नाओं का बोझ लिए फिरता है
आरजूएं थिरकती है उसके मन-आँगन में
ख्वाईशें पनपती है उसके ह्रदय में
उगते है तमाम बीज ख़्वाबों के?
बिना खाद के बगैर पानी के
वह सींचता है उन ख़्वाबों को सिर्फ मन की मुरादों से
कही ख़्वाब उगते है क्या
लेते है शक्ल क्या ऊँचे दरख़्त की
और क्या लगते है डालियों में फल
और अगर ऐसा होता है
तो जरूर चहचहाती होगी तमाम चिड़ियाँ
उस दरख़्त की डालियों पर
पर ख़्वाब तो ख़्वाब है
वो उगते भी है
दरख़्त भी बनते है
पर उन्हें सींचना होगा
पसीने से
देनी होगी म्हणत की खाद
सिर्फ परिकल्पनाओं से नहीं
न ही मुरादों से
कर्म की उंगली पकड़
अब बढेगा ये दरख़्त
और बनेगा
इक घोसला
उस चिड़िया का
जो सदियों से नीड़ की आस में है
फिर तब वक्त का नसीब
घुल जाएगा
उस चिड़िया के गीतों में

कृष्ण कुमार मिश्र(23/24 मई 2014)

Thursday, April 17, 2014

तब बुलाऊंगा तुम्हे..



पीड़ा की तमाम अनुभूतियों के मध्य
तुम्हारे मूक प्रेम की अनुभूति
कर देती है मन को उपवन
जो
मरूस्थल हो गया था
रेत पर प्रेम की नाव खींचते खींचते।
शब्द विह्वल थे!?
और ह्रदय अनुत्तरित!?
भाव घायल
और मन व्यथित
उस धीमी बयार के स्पर्श ने
जो तुम्हे छूकर आ रही थी पूर्व से
कंपित कर दिया देह को
जब रोम रोम दोलित हो रहा था
तब मन के मरूस्थल की रेत भी!
सरक रही थी आहिस्ता आहिस्ता
न जाने कब बारिश ने गीली कर दी
जमीन मन की।
पुष्प खिल गए
मेरे वजूद की जमीन पर
मानो प्रकट हुए हो...

इस मन की अविरल धारा ने
न जाने कब रुख बदल लिया

तुम्हे पता है
धरती के बदलते स्वरूप
बदलती वनस्पतियाँ
उपजते जीव जंतु और नष्ट होते
उस चक्र की निरंतर गति
और निश्चित आवेग जिसे
छेड़ देते है ये मानव
अपनी लालसा से
वासना से
कुछ ऐसा ही तो था
वो मन की धरती का चक्र
ठहर सा गया था
कारण गौड़ है
और विश्लेषण बेमानी
किन्तु अब कुछ उपज रहा है भीतर
आत्मा के आँगन में
तुम्हे खुशी होगी ये जानकार
विवेक भी अब उर्ध्व हो चुका है
और मन सिंचित
प्रेम की वनस्पति का अंकुरण भी
जब यह पेड़ बन जाएगा
तब बुलाऊंगा तुम्हे
इसके मीठे फल खिलाने के लिए
तुम आओगी .....

कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"
(अनायास तो नहीं किन्तु अचानक उपजी कविता। नई कविता!)

Photo&Text Copyright: Krishna Kumar Mishra 2014 


Friday, February 7, 2014

तूने जब हाथ छुडाया तो भनक भी न लगी...




मैं न भूला तुझे न तेरी आशनाई को।
इम्तहां लेना हो तो तेरी राहों में मिले गड्ढों की तादाद गिना दूं। 



उन दरख्तों से बड़ी हमदर्दी सी हो गयी है।
जो तेरे घर की राहों में मुझे मिलते थे।



शायरी झूठ नहीं पर सच भी नहीं है मेरी।
तेरे जाने से फकत अब धूल ही है राहों में।



तेरे शहर के गुलाबी मौसम की कसक।
तुझे पहले की तरह याद करा जाती है ।



उन नजारों की नज़र आज भी इंतज़ार करती है।
तुम्हारा मेरा वो जगह अब भी इंतज़ार करती है। 



तेरी फितरत तो थी कई हमराह बनाने की।
एक हम थे जो तुझे ही मुस्तकबिल बना बैठे थे। 



तुझे चाहा था खुदा को भी इतर रखकर।
तूने तो हम दोनों की तहोबाला कर दी।



मुतमईन था मैं तेरे साथ को हासिल करके।
तूने जब हाथ छुडाया तो भनक भी न लगी।



तेरे पहलू में सुकूँ की आरजू थी हमें।
तूने खराब वक्त में दामन छुडा लिया। 



उसके पहलू में अजीब सी दिलकशी थी।
दामन पकड़ के सोया था सुबह वह ही नदारत थी। 



मेरे माथे पे इक निशाँ जो मुस्तकिल हो गया.
ये तेरे प्यार की इक पुख्ता निशानी है. 



उसने यूं गर न तोड़ा होता मुझको.
तो दुनिया की मुझे यूं न जरूरत होती, 



कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"















हम इकबाल के अल्लाह को हर सुबह गाते है...



तुम मुझसे न सही मेरे अल्फाजों से राब्ता रखना।
आना अगर जानिब मेरी तो सिर्फ मुझसे ही वास्ता रखना। 



एहतराम है तो एतबार की गुंजाइश भी है 
मैं हूँ तो तेरे होने की ख्वाइश भी है .



जहां में इश्क है तो एहतराम लाजिम है 
वरना इंसान तो नफ़रत के सामान लिए बैठा है .



इनायत करे खुदा तो मयस्सर सारी कायनात होगी 
न जाने फिर भी क्यूं आदमी आदमी को सजदा करता है 



वो शिद्दत की बात करती थी और मुद्दत का भी जिक्र 
ये इश्क के लिए था या फकत जिस्म के लिए .



हम तो आये ही थे इस जहां में खुशियों को बाटनें.
खुद को पता नहीं था की एवज में गम से ही राब्ता होगा



लोग जुड़ते हैं जुदा होते हैं ये किस्से तमाम होते हैं.
जो बचता है दिलों में वो बस कुछ फूल तो कुछ काँटों के निशाँ होते है .



बिना जिस्म के रूह कुछ भी नहीं।
यही वो अक्स है जो रूह को झलकाता है। 



वो रहती है मेरे साथ हरदम मैं जहां भी रहता हूँ। 
लोग गफ़लत में होते है की मैं अकेला हूँ ।



बड़ी मुद्दतों से इंतज़ार था तेरा ..
खुद से खुद का करार था मेरा .




उसने भेजा था हमें धरती की तीमारदारी के लिए 
हमने उसे अलग किया और खुद ही मोहतरम बन बैठे.



अल्लाह की इस रहगुजर में न तू तू है न मैं मैं .
गुजरना है सही से तो तू खुद को खुदा की नजर कर दे 



मुल्क की मिल्कियत का ख़याल किसे है 
यहाँ हर शख्स खुद को बेंचता फिर खोजता भी खुद को है



तुम्हारा मुझ से जुदा होना बड़ा ही बेखयाली था 
जब अलग होते थे तो खुद को भूल जाते थे .



वो राहें वो जगहें वो मंजर तुझे तो याद ही होंगे 
जहां हम तुमको पाते थे तुम्ही को खो के आते थे.



तुझे तो याद ही होगा मेरा तुझ पे ही मिट जाना 
कभी खुश तो कभी बेजार हो जाना .



तेरे वास्ते हमने खुद को मिटा दिया 
एक तू थी जिसने मुझको भुला दिया ..कृष्ण (एक सस्ता शेर)



फकत कुछ रोज की ज़िंदगी है मयस्सर मेरे दोस्त 
तू सोचती है क्या मैं हमेशा तुझे एहतराम करूंगा .




तेरी सीरत पे कभी शक न हुआ मुझको तब तलक 
जब तक तूने मेरे इश्क की जगहंसाई न की .



याद है तुझको तेरे वो वादे जिनमें तूने मुझे सबकुछ कहा था 
अपना हिस्सा अपनी किस्मत व् रंगों में बहता खून कहा था 



हमने तो निभाये तेरे खून के रिश्तों को भी अपनों की तरह.
जब मुझको जरूरत थी तेरी तो तूने महज़ कुछ लफ्ज़ कहे 



दांव पर जान और इज्जत रखके हमने तो फकत तुमसे मोहब्बत की थी.
तुमने जो साथ दिया वो तो महज जिस्म से बावस्ता था .



मेरा तो बस गाँव नहर बाग़ से ताल्लुक था कृष्ण 
तुझसे मिले तो बाज़ार की कीमत समझी ...



तेरे जिस्म व् रूह दोनों से मोहब्बत थी हमें 
तूने तो सिर्फ जरूरत को तवज्जो दी थी ..



तेरे अंजुमन में आये हम बार बार।
ये अलग बात है की तूने हर बार तख्लिया कर ली। 


हम तो जीते है कमजोरी के अहद में आजकल,
उनका क्या जिनके पास कदमों तले खुद की जमीन नहीं 


तुर्क अफगानों अरब के उन लुटेरों की नस्ल कायम है इस मुल्क में 
आप खुश हो इसलिए की फिरंगी जा चुके है देश से.



बंदेमातरम कहना भी उनकों रास न आया 
हम इकबाल के अल्लाह को हर सुबह गाते है 


कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"


























तुम्हे पाने की फिर इक नयी तदबीर सूझी है..




फेर ली नज़र तुमने तो काफ़िला रूक जाएगा।
तुमने ग़र आंसू बहाए ज़लज़ला आ जाएगा।

दिल में रखे जो भरम तो फासला हो जाएगा.
मेरे बिना गर तुम चलें तो हौसला खो जाएगा.

इश्क की दौलत नहीं वो याद फिर भी साथ है 
मुझको खो कर तुम चले तो रास्ता खो जाएगा.

ज़िंदगी तो यूं ही गुजर जायेगी एक दिन 
तुम नहीं होगे तो सब बेमजा हो जाएगा 

चलो छोडो वो सब बातें आ जाओ इश्क के दर पर 
वरना जहां में तेरी मेरी दास्ताँ इक फलसफा हो जाएगा

तुम्हे पाने की फिर इक नयी तदबीर सूझी है 
ज़रा देखो मेरी जानिब तो रास्ता मिल जाएगा.

वक्त गुजरता ही रहेगा यूं ही मुसलसल कृष्ण 
मिलने बिछुड़ने का ये किस्सा ही फकत रह जायेगा 

कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"

लगता है अब मेरे ग़मों से बेखबर है वो ...



बड़ी मुद्दतों से न आया कोइ पैगाम उसका 

लगता है अब मेरे ग़मों से बेखबर है वो ...


जिन दरख्तों तले तेरी याद में मैं रोया था जार जार।

गुजरता हूँ जब भी उधर से तो वो तेरा हाल पूंछते हैं । 



दर्द इसलिए नहीं है मुझको की तू मेरे पास नहीं 

अफ़सोस ये है की मैं उन यादों को अब दोहरा नहीं सकता ..


तुझसे और तेरे गाँव से जब नाता हुआ था मेरा 

उन्ही पलों में मेरा सबकुछ हुआ था तेरा ..


मेरी शायरी तो सिर्फ बहाना है 

तुझे बस हाल ए दिल सुनाना है .



यकीं नहीं होता तू इतना करीब आकर मुझसे दूर होगी 

इसीलिए मैं तेरी अब भी राह तकता हूँ ...


वो गाँव वो शहर वो राहें जो तुमसे बावस्ता थी 

कोइ जिक्र करता है तो तेरी सूरत नज़र आती है मुझे .


कभी लगता है यार हम मोहब्बत के काबिल ही न थे 

फिर भी तुमने कितने साल बेजा किए मुझसे मोहब्बत करके ..


वो तमाम सफ़र मुकम्मल करूंगा जरूर इक दिन.

जो अधूरे रह गए थे जब हम साथ साथ थे ..

कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"



Tuesday, January 28, 2014

मेरे शिद्दत से बुलाने पर भी वो न आये



जूनून ए इश्क की रोशन मशालों की तपिश से !

शम्स भी अब्र के चिलमन में जा बैठा ! कृष्ण



शिद्दते ए इश्क की रौनक को वो क्या जाने !

जिनको रिफाकत में भी बाज़ार दिखता है ! कृष्ण



गैरवाजिब तो न था उसको चाहना मेरा !

उसकी रंगीन तबीयत ने इश्क को कुफ्र बना दिया ! कृष्ण



चलो फुर्सत मिली जान ओ दिल को तेरी आशनाई से !

जब से पोशीदा हुए हो तुम मुझसे बड़ी रानाई से! कृष्ण



बेवफाई ने मोहब्बत के गुलिस्ताँ से हमें बर्खाश्त कर डाला।

अब तो बस गम के सिजरे से रिफाकत कर रहे हैं हम। कृष्ण




काश मेरे अश्क अलकमर से रोशन होते शबनम की तरह !

तो आइन्दा मेरे चश्म ए तर गम ए दर्द में नम नहीं होते ! कृष्ण !


जवाब मिलते मुझे मेरे सवालों के उनसे। 
अगर उनमे कुँए सी गहराई होती। कृष्ण      

मेरे शिद्दत से बुलाने पर भी वो न आये।
 सुना है आजकल उनने किसी और से आशनाई कर ली। कृष्ण 

कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"

हमवतन तो हैं वही कुछ लोग नस्ली हो गए



देश की माटी वही है बीज नकली हो गए।

हमवतन तो हैं वही कुछ लोग नस्ली हो गए। कृष्ण



तू इतनी खुद परस्त होगी ये ख्याल न था हमें।

वरना हम मोहब्बत के एवज में व्यापार कर लेते। कृष्ण



रिफाकत को मेरी बस बेंच दी कुछ चंद सिक्कों में। 

फकत हम आज तब भी उन्ही का नाम लेते है। कृष्ण



शनासाई उन्ही से थी उन्ही से इश्क था मुझको।

मगर अफ़सोस ये है कि उन्ही ने क़त्ल कर डाला। कृष्ण



तसब्बुर में मेरे कभी भी वो नहीं आये ।

ये तो खुद ही से खुद को इश्क करने की कवायद थी। कृष्ण  




उनकी रंगीन मिजाजी का तो हम लुत्फ ले बैठे।

बिना समझे कि इक दिन दर्द दिल में बेपनाह होगा। कृष्ण



ज़िंदगी में दिए जो जख्म अपनों ने।

उन्हें भरने में काफी वक़्त निकलेगा। कृष्ण 


मोहब्बत में किसी को खुद की सीरत समझ लेना।
यही इंसान की सबसे बड़ी बेवकूफाना आदत है? कृष्ण (एक सस्ता शेर)

कभी इक मुकम्मल फलसफा था हमारी आशनाई का। 
अब फकत कुछ चंद जुमलों की अहद में रोशनाई है! कृष्ण 

कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"

Friday, January 24, 2014

इनकी आँखों में नीर आ जाए !




तूने तो बख्शी थी इंसानियत हर इंसा को।
मगर यहाँ तो इब्लीसों का बोलबाला है।

कहर है बरपाते हैं आदमी आदिमियत पर।
कहते है ये जेहाद का तहोबाला है।

तूने तो भेजा था मोहब्बत का सबक देकर इनकों।
यहाँ तो नफ़रत का बोलबाला है।

ये खुदा ये तेरे बन्दे सब इब्लीस हो गए।
फरिश्तों ने भी अपनी सिफ़त को बेंच डाला है।
अब सिर्फ तेरे हाज़िर और नाज़िर की जरूरत ही क्या।
जब तेरी कायनात में कुफ्र की पाठशाला है।

जल्द ही तेरा फज़ल हो जाए
इनकी आँखों में नीर आ जाए

इनकी बदनीयत बदल जाए नेकनीयती में
गर तेरा करम हो जाए।

कृष्ण कुमार मिश्र ।।कृष्ण।।

Wednesday, September 5, 2012

जो कभी मैने उससे कहा था......


कुछ खण्डित भावनायें

स्फ़ुटित होती शब्दों में

जो कभी मैने उससे कहा था......
 
क्रोध मत करो वत्स
इस नश्वर संसार में
देखों सब मरे हुए हुए है
या यूं कह लो कि सभी अजन्मा है
 ........................................................?
हम कल भी थे और आज भी है और कल भी रहेगे
हम एक ही तो है
....................................................?
हम हजारो वर्ष पहले भी मिले थे
जब जन्म हुआ था जीवन का
  ?
या इससे पूर्व जब हम जीवित होने की परिभाषा में बधे नही थे
  हम रेत के रूप में थे
 .....?   जल के रूप मे

अग्नि के रूप मे
शिला के रूप में
और जब उस पहली कोशिका का निर्माण हुआ था तब भी हम तुम में ही थे
और आज उस कोशिका ने अपने जैसे तमाम प्रतिरूप गढ़े रूप सरंचनायें बदली
तब भी हम एक ही हैं
दूरियां समाज की परिभाषायें उस तत्व का क्या करेंगी जो जोड़ता है, हम से तुम को...
जिसे महसूस किया है, हमने
इस प्यार के रूप में
हम सभी तो एक है फ़र्क इतना है हम कितने रूपों को अपने भीतर बसायें हैं....

(अधूरा वार्तालाप जो मैने कभी उससे कहा था?)


कृष्ण कुमार मिश्र
--
Krishna Kumar Mishra
Wildlife biologist & Nature photographer
Manhan House
77, Canal Rd. Shiv Colony
lakhimpur-Kheri-262701
Uttar Pradesh, India
Cellular: 09451925997
http://dudhwalive.com
http://krishnakumarmishra.blogspot.com
http://manhanvillage.wordpress.com
http://kabulaha.blogspot.com

Friday, August 31, 2012

उसकी यादें....








मुसलसल याद को उसकी मैं दरिया को दे आया ।

मुझे ठहरी हुई चीजें कभी अच्छी नही लगती ॥

                                                                 --- कृष्ण


 



कृष्ण कुमार मिश्र
09451925997