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Saturday, June 14, 2014

किसी को दर्द बांटना है यारों....


वफ़ा के मायने बदल गए यारो
दर्द अब शौक बन गए यारों

आरजुएं है सिर्फ कुछ पल की
इश्क अब खेल बन गए यारों

किसी को वक्त काटना है
किसी को दर्द बांटना है यारों

न रहनुमाई है न साफगोई है
लोग अब झूठ बन गए यारों

आदमी मिलकियत है हरम में उनके
रस्म ओ रिवाज़ अब खो गए यारों

चमन के फूल भी अब किराए के है
बीज माली भी अब गुजर गए यारों

ख्वाइशें भी खरीद लेते है लोग
कुछ झूठ कुछ फरेब से यारों।

किसे कहे मुस्तकिल है अपने वादों पर
यहाँ पल में दिल को बेंच लेते है यारों

गुजिस्ता दौर था जब किस्सा ए इश्क मौजू था
अब हर रोज फसानों के किरदार बदल जाते है यारों

मौसमी इश्क भी हो गया है अब
शहर बदले नए लोग मिल गए यारों

बड़ी बातें बड़े वादों का तरन्नुम है जुबा पर
फर्श पर आकर बदल गए है वो लोग यारों

इश्क के बाज़ार? में जाना मुनासिब है नहीं
यहाँ तलबगार नहीं सब खरीददार है यारों

कृष्ण कुमार मिश्र (सस्ती नज़्म)

Monday, March 3, 2014

कि मक्का और काशी भी एक हो जाए




नियत पाक और खुदा की नियामत हो जाए।

सारी कायनात में तेरी आरजुओं के दरीचे खुल जाए। 


सोचता हूँ अब उसकी बन्दिगी की जाए।

शायद मेरी भी एड़िया इस्माइल (अलै.) सी एड़िया हो जाए। 



जहां रख दूं पाँव जमीं के दामन पर।
वही से आब ए जमजम की धार छुट जाए।  



वो चाहेगा तो ख़त्म कर देगा सारे दरमियाँ
कि मक्का और काशी भी एक हो जाए।  



अभी वक्त है इंतज़ार करो कुफ्र वालो बस क़यामत तक।
देखिएगा उस ऱोज मोहम्मद भी राम हो जाए।  

अभी वक्त है कायनात के कफ़स में काफिरों का।
वक्त आने दो तब उनका भी हिसाब हो जाए।


कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"

Friday, January 24, 2014

इनकी आँखों में नीर आ जाए !




तूने तो बख्शी थी इंसानियत हर इंसा को।
मगर यहाँ तो इब्लीसों का बोलबाला है।

कहर है बरपाते हैं आदमी आदिमियत पर।
कहते है ये जेहाद का तहोबाला है।

तूने तो भेजा था मोहब्बत का सबक देकर इनकों।
यहाँ तो नफ़रत का बोलबाला है।

ये खुदा ये तेरे बन्दे सब इब्लीस हो गए।
फरिश्तों ने भी अपनी सिफ़त को बेंच डाला है।
अब सिर्फ तेरे हाज़िर और नाज़िर की जरूरत ही क्या।
जब तेरी कायनात में कुफ्र की पाठशाला है।

जल्द ही तेरा फज़ल हो जाए
इनकी आँखों में नीर आ जाए

इनकी बदनीयत बदल जाए नेकनीयती में
गर तेरा करम हो जाए।

कृष्ण कुमार मिश्र ।।कृष्ण।।

Monday, August 27, 2012

कुछ यूँ ही सोचता हूँ !



सोचता हूं कि मैं भी साहिब-ए- वक्त हो जाऊं,
अब तलक मगर मुझको कोई मोहसिन न मिला---कृष्ण



Tuesday, May 25, 2010

माँ से यही तो मांगना है!

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एक  स्तुति जो मेरे ह्रदय में कभी उपजी थी


सरस्वती वन्दना-

हे माँ

विद्यावरदायिनी

वीणा पुस्तकधारिणी

मुझे सदज्ञान दो।


सदा जीवन के पथ पर सतमार्ग दो।

सदा हम ज्ञान के पथ पर चले।

ऐसा हमें वरदान दो॥


सदभावना सत्कर्म और सत्संग को प्रेरित रहें।

सदा मानव जाति में अध्यात्म से पोषित रहें

सदमार्ग में आये अगर बाधा कोई

फ़िर भी कभी सतमार्ग से विचलित न हो॥


हे माँ..............

हे माँ मुझे ज्ञान से विज्ञान से पोषित करो

मस्तिष्क में तुम ज्ञान दो शिव की तरह

जीवन के पथ पर कर्म दो तुम कृष्ण का

आदर्शता दो तुम हमें प्रभु राम की॥


हमको विलक्षण ज्ञान की तुम ज्योति दो

इस ज्योति से कर दू प्रज्ज्वलित धर्म को

ऐसा मुझे अभ्यास दो॥

सभ्यता जीवित रहे मुझ में सदा

ऐसा मुझे वरदान दो॥

(यह रचना मैने अपने पिता स्व० श्री रमेश चन्द्र मिश्र जी के कहने पर उस वक्त लिखी थी जब मैं स्नातक का छात्र हुआ करता था, यह १९९८ के किसी दिन की घटना है, जब ये महान शब्द मेरे मस्तिष्क में उपजे, ये शब्द मुझे इतने प्रिय लगे कि आज तक इस रचना को मैने प्रकाशन के लिये नही भेजा, शायद ये मेरे लिये मेरी सर्वोत्तम कृति रही हो, आज मैं इस दैवीय आराधना व स्व-निर्माण के लिए प्रेरित करने वाली रचना को एक प्रतिष्ठित पत्रिका को भेज दिया है।)



कृष्ण कुमार मिश्र
१- ग्राम- मैनहन पोस्ट-ओदारा
जिला-खीरी
उत्तर प्रदेश

२- 77, शिवकालोनी कैनाल रोड, लखीमपुर खीरी-262701

सेलुलर - 09451925997
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