Friday, June 28, 2013
Wednesday, September 5, 2012
जो कभी मैने उससे कहा था......
कुछ खण्डित भावनायें
स्फ़ुटित होती शब्दों में
जो कभी मैने उससे कहा था......
क्रोध मत करो वत्स
इस नश्वर संसार में
देखों सब मरे हुए हुए है
या यूं कह लो कि सभी अजन्मा है
........................................................?
हम कल भी थे और आज भी है और कल भी रहेगे
हम एक ही तो है
....................................................?
हम हजारो वर्ष पहले भी मिले थे
हम हजारो वर्ष पहले भी मिले थे
जब जन्म हुआ था जीवन का
?
या इससे पूर्व जब हम जीवित होने की परिभाषा में बधे नही थे
हम रेत के रूप में थे
.....? जल के रूप मे
अग्नि के रूप मे
शिला के रूप में
और जब उस पहली कोशिका का निर्माण हुआ था तब भी हम तुम में ही थे
और आज उस कोशिका ने अपने जैसे तमाम प्रतिरूप गढ़े रूप सरंचनायें बदली
तब भी हम एक ही हैं
दूरियां समाज की परिभाषायें उस तत्व का क्या करेंगी जो जोड़ता है, हम से तुम को...
जिसे महसूस किया है, हमने
जिसे महसूस किया है, हमने
इस प्यार के रूप में
हम सभी तो एक है फ़र्क इतना है हम कितने रूपों को अपने भीतर बसायें हैं....
(अधूरा वार्तालाप जो मैने कभी उससे कहा था?)
कृष्ण कुमार मिश्र
--
Krishna Kumar Mishra
Wildlife biologist & Nature photographer
Manhan House
77, Canal Rd. Shiv Colony
lakhimpur-Kheri-262701
Uttar Pradesh, India
Cellular: 09451925997
http://dudhwalive.com
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http://manhanvillage. wordpress.com
http://kabulaha.blogspot.com
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Friday, August 31, 2012
Monday, August 27, 2012
Sunday, June 26, 2011
और प्रादुर्भाव हो बस प्रेम का....
एक कविता जो उसके लिए है !
- कृष्ण
तेरे जीवन के सुखद नववर्ष का आरम्भ हो ।
तिलमिलाती जिन्दगी में एक नया एहसास हो ॥
सूर्य की पहली किरण स्पर्श कर जाए तुझे ।
आभा अलौकिक सूर्य की मुख पर निखर आये तेरे ॥
चांद-तारों, की तरह तेरा प्रयोजन हो सदा ।
घोर अधियारे में हमेशा तू चमक जाए सदा ॥
शब्द निकले प्रेम के जब-जब खुले तेरे अधर।
सत्य की ही राह हो जिस तरफ़ हो तेरे कदम ॥
तेरे ह्रदय में ज्ञान का हो प्रज्ज्वलित दीप ऐसा।
विषमतायें समस्यायें निराशायें दूर हों।
सहजता हो नम्रता हो और हो करूणामयी।
धर्म और सभ्यता से सदा मड़ित रहे॥
मनोबल और भावनाओं में ऊँचाई हो शिखर सी।
अभिव्यक्ति हो भावों में सदा स्नेह की॥
रक्त-रंजित और प्रदूषित इस धरा की मलिनता को।
धैर्य की प्रति-मूर्ति बनकर दूर कर दो सौम्यता से॥
इक छटा सी बिखर जाए लालिमा की।
और प्रादुर्भाव हो बस प्रेम का ॥
कृष्ण कुमार मिश्र
krishna.manhan@gmail.com
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