Friday, January 24, 2014

इनकी आँखों में नीर आ जाए !




तूने तो बख्शी थी इंसानियत हर इंसा को।
मगर यहाँ तो इब्लीसों का बोलबाला है।

कहर है बरपाते हैं आदमी आदिमियत पर।
कहते है ये जेहाद का तहोबाला है।

तूने तो भेजा था मोहब्बत का सबक देकर इनकों।
यहाँ तो नफ़रत का बोलबाला है।

ये खुदा ये तेरे बन्दे सब इब्लीस हो गए।
फरिश्तों ने भी अपनी सिफ़त को बेंच डाला है।
अब सिर्फ तेरे हाज़िर और नाज़िर की जरूरत ही क्या।
जब तेरी कायनात में कुफ्र की पाठशाला है।

जल्द ही तेरा फज़ल हो जाए
इनकी आँखों में नीर आ जाए

इनकी बदनीयत बदल जाए नेकनीयती में
गर तेरा करम हो जाए।

कृष्ण कुमार मिश्र ।।कृष्ण।।

Wednesday, August 7, 2013

Pieces of My Heart- Krishna




फता भर ढूदते रहे वो हमदम,
 अफ़सोस की वो खुद की फितरत न बदल पाए. कृष्ण

 दोस्ती के सबब क्या है ताकीद नहीं उनको,
 वो तो हर रोज नई शक्ल में ढलते है! कृष्ण

राहें बदल गई मंजर बदल गए,
अफ़सोस है की नाज़िर की फितरत बदल गयी! कृष्ण

परस्तिश के ख्वाइश मंद थे हम,
 हमें क्या मालूम था कि हमने बुत से मोहब्बत की है! कृष्ण

जिस्म के कारोबार में रूहे भी बदल गयी,
 शक्ल तो मौजूं है, सीरत बदल गयी. कृष्ण

तेरे हर लफ्ज को ज़िंदगी दी हमने,
 तूने कई बरसों बाद फकत कुछ मुर्दा लफ्ज कहे ! कृष्ण

तेरे रुखसार हथेली में लेकर,
 जी तो करता है कि बोसों की बारिश कर दूं ! कृष्ण  
  
हमारी मोहब्बत से खौफ जदा है लोग, 
क्यों की उन्हें मोहब्बत का कोई फ़साना नहीं आता ! कृष्ण

बड़े एहतराम से आये थे तेरी गली में,
 तुझको सलाम किए बगैर लौटना नसीब था ! कृष्ण

तुम्हारी गलियों तक ही तवाफ नहीं किया है हमने,
 हम तो मीलों से फना होने चले आये है! कृष्ण 

हम तेरे मुन्तजिर तो नहीं, तेरे जिस्म ओ रूह के सौदाई है!
देख ये मेरी मोहब्बत है, और ये तेरी शिनासाई है ! कृष्ण

 तुम गलियों के सबब की बात करती हों,
 हम तो मीलों से फना होने चले आये हैं! कृष्ण

वो मेरे जिस्म में पैबस्त है खंजर की तरह,
 निकालू तो दर्द बढ़ता है! कृष्ण

वो जब भी मिली मुझसे गुलाबी सहरा में,
 अब्र ने बारिश का तोहफा दिया...कृष्ण

उस शहर में अब तामीर-ए- मोहब्बत होगी,
ताज वाला भी जहन्नुम में शर्म खायेगा!...कृष्ण

वो पोशीदा हुई मुझ से उसे क्या मालूम,
 कि उसने खुद से खुद को पोशीदा किया है ! कृष्ण

बेखुदी का आलम कुछ इस कदर है,
कि उस शहर में उसी का अक्स बिखरा हुआ है चारों तरफ....कृष्ण

एक चिड़िया के इरादे देखो।
 नशेमन मुसलसल बुनती रहती है, हर तूफ़ान के जाने के बाद...कृष्ण
     

Copyright: Krishna Kumar Mishra (krishna.manhan@gmail.com)

Friday, June 28, 2013

मेरे उसके कुफ़्र



हमें समझते है वो सब चश्म ए सहरा का मरीज ।
 हमने कभी सहरा में भी गुलिस्तान बनाए है ।।
 
हमारे हाल पे यूँ न तरस ।
 हम कई बार गम ए सहरा से निकल आये हैं ।।
 
मेरे दीवानेपन पर तंज न कर । 
मैंने इश्क में कई ताज बनाए है ।।
 
वो काफिर निकला इसमें कोई ताज्जुब न हुआ "कृष्ण" ।। 
सुना है आजकल मशरिकी भी छोड़ दी उसने ।।
 
कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"
 
 

Wednesday, September 5, 2012

जो कभी मैने उससे कहा था......


कुछ खण्डित भावनायें

स्फ़ुटित होती शब्दों में

जो कभी मैने उससे कहा था......
 
क्रोध मत करो वत्स
इस नश्वर संसार में
देखों सब मरे हुए हुए है
या यूं कह लो कि सभी अजन्मा है
 ........................................................?
हम कल भी थे और आज भी है और कल भी रहेगे
हम एक ही तो है
....................................................?
हम हजारो वर्ष पहले भी मिले थे
जब जन्म हुआ था जीवन का
  ?
या इससे पूर्व जब हम जीवित होने की परिभाषा में बधे नही थे
  हम रेत के रूप में थे
 .....?   जल के रूप मे

अग्नि के रूप मे
शिला के रूप में
और जब उस पहली कोशिका का निर्माण हुआ था तब भी हम तुम में ही थे
और आज उस कोशिका ने अपने जैसे तमाम प्रतिरूप गढ़े रूप सरंचनायें बदली
तब भी हम एक ही हैं
दूरियां समाज की परिभाषायें उस तत्व का क्या करेंगी जो जोड़ता है, हम से तुम को...
जिसे महसूस किया है, हमने
इस प्यार के रूप में
हम सभी तो एक है फ़र्क इतना है हम कितने रूपों को अपने भीतर बसायें हैं....

(अधूरा वार्तालाप जो मैने कभी उससे कहा था?)


कृष्ण कुमार मिश्र
--
Krishna Kumar Mishra
Wildlife biologist & Nature photographer
Manhan House
77, Canal Rd. Shiv Colony
lakhimpur-Kheri-262701
Uttar Pradesh, India
Cellular: 09451925997
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http://krishnakumarmishra.blogspot.com
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Friday, August 31, 2012

उसकी यादें....








मुसलसल याद को उसकी मैं दरिया को दे आया ।

मुझे ठहरी हुई चीजें कभी अच्छी नही लगती ॥

                                                                 --- कृष्ण


 



कृष्ण कुमार मिश्र
09451925997


Monday, August 27, 2012

कुछ यूँ ही सोचता हूँ !



सोचता हूं कि मैं भी साहिब-ए- वक्त हो जाऊं,
अब तलक मगर मुझको कोई मोहसिन न मिला---कृष्ण



खयाल





उसका इक निशां बाकी रह गया मेरे दयार में
सोचता हूं दरिया में बहाऊं या सुपुर्दे खाक करूं----कृष्ण