नाज़ हमको भी था दीवानों की शखसिअत पर
दिलो मे झांक कर देखा तो गमगीनिओ का इज़ाफा निकला
जिसको समझता था मै कोहिनूर अब तक
आज़ देखा तो वह पतथर निकला
आशा थी मुझे सूरज की चमक होंगी उसमे
रात मे देखा तो दम तोडत हुआ दीपक निकला
जिसे कहता था अपने घर का चान्द
अधियारी रात मे देखा तो टिमटिमाता हुआ तारा निकला
जिसे समझता था बुजरगो की दुआ का आलम
मौके वारदात पर वहा काफिर निकला
जिसे समझता था गुलिस्तान अब तक
शैरे गुलसन की तो वहा कांटो का अशियाना निकला
जिसे समझता था प्रेम का मकान
वहा देखा तो गम का कारखाना निकला

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