Sunday, April 13, 2014

चलो छोड़ो अब इस झूठ के ताल्लुक को ही जारी रखिए...




इस मखमली गुलाब को जब हरियाली के दरीचे से झांकते देखा.
ला मुहाला उस नाज़मीन का चेहरा मेरे तसव्वुर में आ गया. 


हमारे नसीब में अश्कों की इक लम्बी दास्ताँ है।
आज सपने में मिले भी तो रोये बहुत थे हम।


इमारत बन नहीं पाई इबारत लिख गयी पहले।
यही बाकी निशाँ है आज कल के शाहजहाँओ का। 


जिन्हें मालूम नहीं रंगों की तासीर।
वे हाथों में कुछ बेजान से रंग लिए फिरते हैं।


रंग तो आफताब से है जिनकी एहसासों से शनासाई है।
संग ए दिल को खबर ही क्या की रंगों की बहार आई है।


तुम रोये तो मैं समंदर हो ग़या तुम हँसे तो मैं सीप बन गया।
फर्क अश्क ने बयाँ किया कभी खारी बूँद तो कभी गुहर हो गया।


बड़े फ़क्र से सब सालिम कहा करते थे मुझे।
लौटा जब तेरे पास से तो टुकड़ों में वजूद था मेरा।


ख़्वाबों का क्या वो तो कुछ भी देख लेते है।
कभी खुशी तो कभी दर्द के संग हो लेते है। 


जुदा होने की रस्मों के उस बेदर्द मंजर ने तड़पाया बहुत था।
आज सपने में मिले उससे तो खौफ ए जुदाई ने रुलाया बहुत था।


झूठ की आड़ में कितने गढ़े किस्से तुमने।
चलो छोड़ो अब इस झूठ के ताल्लुक को ही जारी रखिए।


नस्ल दागी है जहन पाक नहीं तो कोई बात नहीं।
सिलसिला फ़रेब ए मोहब्बत का तो ज़ारी रखिए।


कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"

Monday, March 3, 2014

कि मक्का और काशी भी एक हो जाए




नियत पाक और खुदा की नियामत हो जाए।

सारी कायनात में तेरी आरजुओं के दरीचे खुल जाए। 


सोचता हूँ अब उसकी बन्दिगी की जाए।

शायद मेरी भी एड़िया इस्माइल (अलै.) सी एड़िया हो जाए। 



जहां रख दूं पाँव जमीं के दामन पर।
वही से आब ए जमजम की धार छुट जाए।  



वो चाहेगा तो ख़त्म कर देगा सारे दरमियाँ
कि मक्का और काशी भी एक हो जाए।  



अभी वक्त है इंतज़ार करो कुफ्र वालो बस क़यामत तक।
देखिएगा उस ऱोज मोहम्मद भी राम हो जाए।  

अभी वक्त है कायनात के कफ़स में काफिरों का।
वक्त आने दो तब उनका भी हिसाब हो जाए।


कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"

वो इलेक्ट्रानिक दरीचों से झांकती है मुझे हरदम।




तुम्हे तो खुद पे एतबार नहीं मेरे वजूद पर सवाल करते हो 
ज़रा देखों मेरी जानिब तुम तो मुझसे ही प्यार करते हो.



समझ में क्यों नहीं आता हमारे वजूद पर कीचड उछालने वालों 
हम फलक के चाँद है अंधेरों में रोशन जहां को करते हैं.



दिल में साफगोई न हो तो इश्क की बात मत करिए 
फरेब से किसी को अपना बनाने की बात मत करिए .



चलो मिलने मिलाने की ये कवायद ख़त्म करते हैं.
बहुत हुआ मोहब्बतों का ये खेल इसे अब बंद करते हैं .



वो इलेक्ट्रानिक दरीचों से झांकती है मुझे हरदम।
मेरी जिद है की वो अपने घर की खिड़की में नज़र आये.



हमें मालूम न था की अल्लाह ने कुछ रूहानी सिफ़त दी है मुझे।
जहन को मेरे आब ए जमजम सी सिफ़त दी है मुझे। 

बस रूह मेरी अब तिलमिला उठी है कुफ्र वालों से।
जो भी आता है पाक होता है और अपने मैल छोड़ जाता है।



मैं रफ्ता रफ्ता उसी का हो रहा था।
मगर वो अपने कुफ्र मुझमें धो रहा था।



किसी की चाह में खुद को भुला देने की नीयत आसमानी हो गयी है 
इश्क में ताज बना देने की वह कहानी अब पुरानी हो गयी है .



तू याद आती है तो कुछ पुराने गीत याद आते है। 
जो गुनगुनाएं थे कभी जब हम साथ साथ थे।



उसकी याद ने जब जब जहन में अंगड़ाई ली।
मेरे चश्म ए तर में तब तब आंसुओं ने डेरा डाला। 



कृष्ण खुश होने के लिए ख़्वाब का सब्ज़ बाग़ अच्छा है.
किसी को खोकर किसी को पाने का यह ख़याल अच्छा है.



कहानी रुख बदलती है तो दिलों को दूर करती है।
नदी जब रुख बदलती है तो जमीं तक्सीम करती है। कृष्ण 

नहीं समझे अगर अब भी तुम अफसानों के नकली ढंग
तो मत कहना की मंजिल दूर है अब दम निकलती है।



मौका परस्ती हमने भी सीख ली तुम्हारे साथ रह कर।
वरना हम किसी हाल में हो गुजारिश नहीं करते थे कभी। 



बेवजह मुस्कारने की बात पूँछी थी। 
दिल लगाने के सबब में जवाब मौंजू है।



वो जरूर फर्क समझ जाते नफ़रत और मोहब्बत में।
अगर उन्होंने दिल दिमाग के फासले की पैमाइश की होती।



दर्द में मुस्कारने की अदा हर किसी को नहीं आती।
जो मिटा नहीं किसी पे उसे बेवजह मुस्कारने की अदा नहीं आती।



जिन्हें इश्क की सिफत नहीं मालूम 
वो बेवजह मुस्कारने का सबब पूंछते है।



इश्क के गुजिस्ता दौर में जब कहानी ने रूख बदला। 
तभी से हमको बेवजह मुस्कारने की आदत सी हो गयी। 


कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"





बड़ी अजीब है लोगो की फितरत यहाँ कृष्ण 
चोट किसी और से खाते हैं देते किसी और को हैं.

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ज्ञान की उन्नति के साथ परिभाषाये भी बदलती है पर बिना पहली वाली परिभाषा के दूसरी परिभाषा कैसे संभव। कृष्ण

वक्त तो स्थिर है वत्स वो न आता है न जाता है बस जरूरत है वक्त को तुम अपना कब बना पाते हो। कृष्ण

Wednesday, February 26, 2014

तब से आँख ने खारे पानी के समन्दर की शक्ल ले ली।



बहुत अज़ीज़ थे तुम मेरे हबीब थे तुम 
दौर गुजरा तो तुमने दुश्मनी का रिश्ता भी न मुनासिब समझा



फिर न कहना की देश की हालत खराब है 
तुमने जो महज़ कुछ सिक्कों के लिए बेखुदी चुन ली



आरजुएं भटकती है मुर्दों के आस पास 
तमन्नाओं ने ज़िंदा लोगों को ज़िंदगी दी है



इश्क अब पुराने दिनों की बात है कृष्ण 
जिस्म के बाजार ने जज्बातों की तहोबाला कर दी



इश्क के बाज़ार में हम रोज़ सैर करते है 
बड़े करीने से लोग कहते है की हम सिर्फ तुमसे प्यार करते है.



तू न होती तो ये किस्से तमाम न होते 
तेरे बगैर इश्क के हम इल्मदार न होते .



यहाँ ताल्लुक के लिए भी व्यापार होता है।
हमें इल्म न था हम तो जमीनों में जिंदगियां उगाते हैं।



तेरी याद में जो बोये थे बीज हमने।
वो दरख़्त बनकर नए बीज देने लगे हैं। 



तेरे भी अश्क गिरे थे मेरे अश्कों के साथ साथ।
चलो चले उस जगह पर इक पेड़ लगाया जाए।



चलो चले उस दश्त के शहर कुछ खोजा जाए।
कहीं तो सहरा की रेत आज भी मेरे आंसुओं से नम होगी। 



कुछ लोग बड़े अजीब होते है।
होते रकीब है पर दिखने में अजीज होते है।



तुझसे मुसलसल ताल्लुक की तमन्ना ही रह गयी।
तुम्हे तो फकत कुछ ख्वाईशों को उरूज़ देना था। 



वो लम्हात कई सदियों का इंतज़ार लगते थे।
पर तेरे आने की आस में वक्त सरकता बड़े मज़े से था।



जब से मुस्कराने के सबब छीन लिए उसने।
तब से आँख ने खारे पानी के समन्दर की शक्ल ले ली।



इश्क तो लम्हात की कहानी है।
तमाम मसायल में सारी उम्र को गर्त होना ही था। 



उसने देखकर मेरी जानिब सिहर कर नज़र फेर ली थी।
मेरी आँखों में जो प्यार की सुनामी उमड़ रही थी। 



तेरे जाने के बाद हमें साये भी डराने लगे 
तू साथ थी तो परछाईयों का ख़याल किसे था.



उस यकीन के टूटने की चटक यूं जज्ब हो गयी जहन में 
अब तो हर एक आहट पे खौफ खाता हूँ .



उसे खोजा हर तरफ उस नकाबपोशों के शहर में 
दश्त में जिधर देखता था वही नज़र आती थी 



दिले मासूम का इरादा तो नेक था 
हज़ार राह में आये पर नज़र में वही एक था



खौफ खूबसूरत होने का है या दिल में कोई मलाल है 
लोग चेहरों पर मुख्तलिफ चेहरे लिए फिरते है



गुज़री हुई चीजों से एहतराम क्या करना।
जो खो गया हो उसका इंतज़ार क्या करना।



तेरी आस में तेरे सहरा में भटका हूँ पागलों की तरह।
सोचा था की आँचल से पोछेगी तू पसीना मेरे माथे का । 


कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"

रिश्तों की अवधारणा के पीछे सबसे बड़ी वजह रही होगी स्त्री पुरूष के संबंधों के बीच मर्यादा की स्थापना।।। नहीं तो समाज की परिकल्पना ही असंभव होती। कृष्ण



























Sunday, February 23, 2014

तुम हमारे बगैर दिवाली की राह तकते हो।



कुछ शेर जो ग़ज़ल के टुकड़ों की मानिंद पेश ए खिदमत है। सभी मोहतरम और मोहतरमा हौसला अफजाई जरूर करे ताकि ये टुकड़े मुकम्मल ग़ज़लों में तब्दील हो सके।


हम मुस्तकिल है ऊंचे दरख्तों की तरह जिनकी जड़े धरती को जकड़ लाती है। 
जिन्हें टिकना नहीं है इक मुकाम पर उनकी जड़े गमलों में कसमसाती है।

अब तो लोग दरख्तों को गुलामी दे रहे है
पीपल बरगद को तसले में कैद कर रहे है।


वो लोग जो खुद को बड़ा कहते रहे।
करीब गया तो वहां बोसनाई मिली।


चोट कैसी भी हो जब दर्द भी घबरा जाए
इश्क ऐसा हो की पत्थर में भी घाव कर जाए।


इश्क के खेल में कुछ भी मुस्तकिल नहीं होता।
कभी दिल चटकता है तो कभी नसीब फूटता है।


और भी चेहरे है जनाब के।
ज़रा हिजाब तो उठाओ यारो। 


आप को रखना नहीं मुझसे वास्ता कोई तो कोई बात नहीं।
तामाम कुफ्र दिल में रहते है तो मोहब्बत की कोई बात नहीं।


तुझे देता हूँ दरिया सी रवानी समंदर सी गहराई 
फिर न कहना की तुम उथले थे सो बहते चले गए..

 (बड़ा विरोधाभाषी ख़याल है..किन्तु पूरक है एक दूसरे से ...समझिएगा संभल कर ...)


हमारे इश्क की वो कहानी जो वही पर रह गयी थी 
बचा था जो उसे दरिया समंदर के हवाले कर रही है 


कहाँ मिटता है कुछ भी जो लिखा तुमने मोहब्बत में 
पेड़ पौधे हवा पानी सभी वो गुनगुनाते है


घर की चौकठ का भी सज़दा करते है हम 
उन्हें! मालूम ही क्या खुदा रहता कहाँ है .


बलंदी आजकल सस्ते दामों में मिलती है 
मगर इस शर्त पर की वो बे बुनियाद होगी.


चलो बुनियाद के पत्थर को सलाम कर लिया जाए
इमारत ढह गयी है मलबे की ईंट को मंदिर में रख लिया जाए


गुजिस्ता दौर के किस्से अजीब थे
अब जो रकीब है तब वो हबीब थे ! 


अब्र के टुकड़ों को चांदी समझ बैठे है लोग 
कुछ जोकरों को गांधी समझ बैठे है लोग ..


तू रोया तो अब्र रोया 
बूँद में बस फर्क खारेपन का था 


एखलाक की उम्मीद में उम्र गुज़र गयी
बाजारू मोहब्बत में हम बिकते चले गए.


बड़े बेमुरब्बत है लोग यहाँ
बिना जरूरत के पहचानते नहीं


मोहब्बत क्या है मुझे इल्म नहीं
बस तेरे होने की शिनाख्त है मुझको .


मुझे नहीं मालूम इश्क क्या है 
मेरा तो सिर्फ तुझसे वास्ता था


अल्फाज़ वो जरिया है जो एहसासों को वजूद देते है 
तुमने झूठे एहसासों के लिए अल्फाजों की बेइज्जती की है.

दूरियां थी मगर हम दूर न थे तब तक 
जब तक तूने मुझसे बेईमानी न की

किसी ने फायदे के सिवा कुछ भी नहीं चाहा 
एक हम थे जो जानकार भी ठगते रहे .

ज़िंदगी में दौर ए सिलसिला इस तरह आया 
लोग बस फ़ायदा उठाते चले गए 

तेरी बेवफाई का सबब पता है मुझको।
फिर क्यों तुम खुद को कोसती हो।

तेरे न होने का कोंई सवाल नहीं।
तुम तो मेरी ही इबारत हो।

चाँद के बगैर शबनम रौशन नहीं होती।
तुम हमारे बगैर दीवाली की राह तकते हो।

शेर के अक्स में भेडिये घुस तो आये है।
पंजों के निशानों ने जमीं को इत्तला कर दी।

वक्त की सिफ़त है गुज़र जाना
इश्क में रूकने की हिदायत है।

इश्क लम्हों में गिना जाता है।
तुम वर्षों की बात करते हो।

नस्ल की बुनियादी समझ जरूरी है।
हरामखोरों की तस्दीक भी जरूरी है।

कुछ बेवजूद बेमुरब्बत कुफ्र वालों से वास्ता हो गया मेरा।
खुद को तौला तो खुद ही पे शर्मसार हुआ।

बसंत फिर आकर चला गया 
तेरा ऋतुओं से भी वास्ता है !

वो लोग जो इश्क में रस्म ए रवादारी की बात करते है।
जो मोहब्बत की इब्तिदाई किताब को रद्दी की दुकाँ पे बेंच आये है। 

उन्होंने होश ओ हवास में मेरी मोहब्बत की तहोबाला कर दी।
हम होश खो कर भी इश्क की हर रस्म निभाते चले गए। 

इतनी मिलती है उस चिड़िया से सीरत उसकी।
जब भी मिलती है तो चोच लड़ाती है वो। 

तुझे पाना जो मेरा नसीब था

तेरा हिज्र भी तो अजीज है।

तू नहीं है जो मेरी हयात में
फिर भी तू दिल के करीब है

हर कहानी का सबब होता कहाँ है खुशनुमा।
एक दिन हम भी हँसे थे पहली दफा जब तुम मिली थी।

आँख में रहती नमीं थी जब हम दोनों साथ थे।
कम से कम अश्कों को अब थोड़ी मोहलत तो मिली है।

गम जुदाई का नहीं अब सालता होगा तुम्हें
रिश्ते दरकने से हमें बदले में ये राहत तो मिली है।

रात दिन की वो तड़प मिलना तेरा फिर दूर हो जाना।
मेरी जाँ चलो छोड़ों दिलों जाँ को अब फुर्सत तो मिली है।


भूख से बेहाल बच्चों की जरूरत है फकत कुछ रोटियाँ
इल्मदारी चुटकले और खिलौने ये सभी बेकार है।


पेट भूखा मगज़ सूखा ये हालात है हिन्दूस्तान के।
आप कहते हो की हम कायदे आज़म है इस कायनात के।


तेरा करम हुआ तो तुझे तेरी कसम दुनिया को बनाने वाले 
तेरी कायनात की खिदमत में इक दिन बड़ा नाम करूंगा.


मुद्दतें गुजर गयी उससे रूबरू हुए ।
मगर ख़्वाबों में हर ऱोज मिला करता हूँ।


मुसलसल चाह में तेरी दरिया सी रवानी है।
फकत बस चंद बांधों ने तेरी रफ़्तार कम की है।


प्रेम की कोई मुक़र्रर तारीख नहीं होती।
महसूस करो ये तो लम्हों का मामला है।


मोहब्बत दिलों में नहीं अब बाज़ार की चीज हो गयी।
इस मुसलसल ज़ज्बात की भी इक तारीख हो गयी।


मुस्तकिल रिश्तों की अब बुनियाद खो गयी।
इश्क की भी मुक़र्रर इक तारीख हो गयी।


दर ओ दीवार में उग आये है मुख्तलिफ़ दरख्त।
हम तो वीराने में है मगर चिड़ियों ने गुलज़ार कर रखा है घर।



कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"









Friday, February 7, 2014

चलो चले उस चिड़िया को हंसाया जाए...



गौरैया तुझे जब देखता हूँ अपने आँगन में 
तो उसके घर में तेरा वो नशेमन याद आता है. 



उसने दिखाया था तेरा वो घोसला जो उसके उस मकान में था 
तू मेरे घर को मुस्तकिल नशेमन बना ले तो मुझको तसल्ली हो. 



गौरैया तुम रेत में घरौंदे क्यों बनाती हों जो बिखरते है हल्की बयार से.
चलो आओ माटी के घर अब भी तुम्हारा इंतज़ार करते है.



उस चिड़िया की चहचहाहट सुने हुए मुद्दतें गुज़र गई.
दूर से आती हुई उसकी सिसकियाँ मुझे अब सोने नहीं देती. 



चलो चले उस चिड़िया को हंसाया जाए 
सूने से चमन को गुलिस्तान बनाया जाए. 


 कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"







तूने जब हाथ छुडाया तो भनक भी न लगी...




मैं न भूला तुझे न तेरी आशनाई को।
इम्तहां लेना हो तो तेरी राहों में मिले गड्ढों की तादाद गिना दूं। 



उन दरख्तों से बड़ी हमदर्दी सी हो गयी है।
जो तेरे घर की राहों में मुझे मिलते थे।



शायरी झूठ नहीं पर सच भी नहीं है मेरी।
तेरे जाने से फकत अब धूल ही है राहों में।



तेरे शहर के गुलाबी मौसम की कसक।
तुझे पहले की तरह याद करा जाती है ।



उन नजारों की नज़र आज भी इंतज़ार करती है।
तुम्हारा मेरा वो जगह अब भी इंतज़ार करती है। 



तेरी फितरत तो थी कई हमराह बनाने की।
एक हम थे जो तुझे ही मुस्तकबिल बना बैठे थे। 



तुझे चाहा था खुदा को भी इतर रखकर।
तूने तो हम दोनों की तहोबाला कर दी।



मुतमईन था मैं तेरे साथ को हासिल करके।
तूने जब हाथ छुडाया तो भनक भी न लगी।



तेरे पहलू में सुकूँ की आरजू थी हमें।
तूने खराब वक्त में दामन छुडा लिया। 



उसके पहलू में अजीब सी दिलकशी थी।
दामन पकड़ के सोया था सुबह वह ही नदारत थी। 



मेरे माथे पे इक निशाँ जो मुस्तकिल हो गया.
ये तेरे प्यार की इक पुख्ता निशानी है. 



उसने यूं गर न तोड़ा होता मुझको.
तो दुनिया की मुझे यूं न जरूरत होती, 



कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"