Tuesday, July 3, 2007

ग़ज़ल्


इश्क वो इबादत है

आंखो में हो आंसू

ओंठो पे मुशकान उभर आये


प्यार मे टूट कर मंजिल पर पहुंच जाये


महबूब के दीदार से दिल मे पाकीजगी का हो एहसास

और दिल से निकली हुई आहो मे हो दुआये


कितना ही क्यो न हो महबूब फरेबी

फिर भी देखो जब उसे तो प्यार उमड आये


तेरा काम ही है आशनायी कृष्ण

बात तब है जब बेवफायी पर भी तुझको प्यार आये

Monday, July 2, 2007

ग़ज़ल्


नाज़ हमको भी था दीवानों की शखसिअत पर

दिलो मे झांक कर देखा तो गमगीनिओ का इज़ाफा निकला


जिसको समझता था मै कोहिनूर अब तक

आज़ देखा तो वह पतथर निकला


आशा थी मुझे सूरज की चमक होंगी उसमे

रात मे देखा तो दम तोडत हुआ दीपक निकला


जिसे कहता था अपने घर का चान्द

अधियारी रात मे देखा तो टिमटिमाता हुआ तारा निकला


जिसे समझता था बुजरगो की दुआ का आलम

मौके वारदात पर वहा काफिर निकला


जिसे समझता था गुलिस्तान अब तक

शैरे गुलसन की तो वहा कांटो का अशियाना निकला


जिसे समझता था प्रेम का मकान

वहा देखा तो गम का कारखाना निकला

ग़ज़ल्




आज तेरी याद मुझको सताती है बहुत
आज की रात प्यासी है बहुत

तेरा एहसस समन्दर की तरह है
तेरी याद मुझे तडपाती है बहुत

एक ख्वाइस हि तेरे दीदार की मुझे
ज्यादा न सही कुछ लम्हो के किरदार की तेरे

ग़ज़ल्

आज तेरी याद मुझको सताती है बहुत
आज की रात प्यासी है बहुत

तेरा एहसस समन्दर की तरह है
तेरी याद मुझे तडपाती है बहुत

एक ख्वाइस हि तेरे दीदार की मुझे
ज्यादा न सही कुछ लम्हो के किरदार की तेरे

ग़ज़ल्

आज तेरी याद मुझको सताती है बहुत
आज की रात प्यासी है बहुत
तेरा एहसास समन्दर की तरह है
तेरी याद मुझे तड्पाती है बहुत
एक ख्वाइस है तेरे दीदार की मुझे
ज़्यादा न सही कुछ लम्हो के किरदार की तेरे

ग़ज़ल्




कौन रहता है मुस्तकिल अपने असूलो पर
लोग हर लम्हा यहा रंग बद्लते है
किस पर हो यकी किस पर गुम करू
लोग हर् रोज नई शक्ल मे धलते है
किससे करू वफा वेवफा किसे कहू
यहा नफरत को लोग बडे ढंग से समझते है
मिजाज अपना ही बदल लेता हू कृष्ण
दीवनगी की लोग यहा कद्र कहा करते है