Sunday, February 23, 2014

तुम हमारे बगैर दिवाली की राह तकते हो।



कुछ शेर जो ग़ज़ल के टुकड़ों की मानिंद पेश ए खिदमत है। सभी मोहतरम और मोहतरमा हौसला अफजाई जरूर करे ताकि ये टुकड़े मुकम्मल ग़ज़लों में तब्दील हो सके।


हम मुस्तकिल है ऊंचे दरख्तों की तरह जिनकी जड़े धरती को जकड़ लाती है। 
जिन्हें टिकना नहीं है इक मुकाम पर उनकी जड़े गमलों में कसमसाती है।

अब तो लोग दरख्तों को गुलामी दे रहे है
पीपल बरगद को तसले में कैद कर रहे है।


वो लोग जो खुद को बड़ा कहते रहे।
करीब गया तो वहां बोसनाई मिली।


चोट कैसी भी हो जब दर्द भी घबरा जाए
इश्क ऐसा हो की पत्थर में भी घाव कर जाए।


इश्क के खेल में कुछ भी मुस्तकिल नहीं होता।
कभी दिल चटकता है तो कभी नसीब फूटता है।


और भी चेहरे है जनाब के।
ज़रा हिजाब तो उठाओ यारो। 


आप को रखना नहीं मुझसे वास्ता कोई तो कोई बात नहीं।
तामाम कुफ्र दिल में रहते है तो मोहब्बत की कोई बात नहीं।


तुझे देता हूँ दरिया सी रवानी समंदर सी गहराई 
फिर न कहना की तुम उथले थे सो बहते चले गए..

 (बड़ा विरोधाभाषी ख़याल है..किन्तु पूरक है एक दूसरे से ...समझिएगा संभल कर ...)


हमारे इश्क की वो कहानी जो वही पर रह गयी थी 
बचा था जो उसे दरिया समंदर के हवाले कर रही है 


कहाँ मिटता है कुछ भी जो लिखा तुमने मोहब्बत में 
पेड़ पौधे हवा पानी सभी वो गुनगुनाते है


घर की चौकठ का भी सज़दा करते है हम 
उन्हें! मालूम ही क्या खुदा रहता कहाँ है .


बलंदी आजकल सस्ते दामों में मिलती है 
मगर इस शर्त पर की वो बे बुनियाद होगी.


चलो बुनियाद के पत्थर को सलाम कर लिया जाए
इमारत ढह गयी है मलबे की ईंट को मंदिर में रख लिया जाए


गुजिस्ता दौर के किस्से अजीब थे
अब जो रकीब है तब वो हबीब थे ! 


अब्र के टुकड़ों को चांदी समझ बैठे है लोग 
कुछ जोकरों को गांधी समझ बैठे है लोग ..


तू रोया तो अब्र रोया 
बूँद में बस फर्क खारेपन का था 


एखलाक की उम्मीद में उम्र गुज़र गयी
बाजारू मोहब्बत में हम बिकते चले गए.


बड़े बेमुरब्बत है लोग यहाँ
बिना जरूरत के पहचानते नहीं


मोहब्बत क्या है मुझे इल्म नहीं
बस तेरे होने की शिनाख्त है मुझको .


मुझे नहीं मालूम इश्क क्या है 
मेरा तो सिर्फ तुझसे वास्ता था


अल्फाज़ वो जरिया है जो एहसासों को वजूद देते है 
तुमने झूठे एहसासों के लिए अल्फाजों की बेइज्जती की है.

दूरियां थी मगर हम दूर न थे तब तक 
जब तक तूने मुझसे बेईमानी न की

किसी ने फायदे के सिवा कुछ भी नहीं चाहा 
एक हम थे जो जानकार भी ठगते रहे .

ज़िंदगी में दौर ए सिलसिला इस तरह आया 
लोग बस फ़ायदा उठाते चले गए 

तेरी बेवफाई का सबब पता है मुझको।
फिर क्यों तुम खुद को कोसती हो।

तेरे न होने का कोंई सवाल नहीं।
तुम तो मेरी ही इबारत हो।

चाँद के बगैर शबनम रौशन नहीं होती।
तुम हमारे बगैर दीवाली की राह तकते हो।

शेर के अक्स में भेडिये घुस तो आये है।
पंजों के निशानों ने जमीं को इत्तला कर दी।

वक्त की सिफ़त है गुज़र जाना
इश्क में रूकने की हिदायत है।

इश्क लम्हों में गिना जाता है।
तुम वर्षों की बात करते हो।

नस्ल की बुनियादी समझ जरूरी है।
हरामखोरों की तस्दीक भी जरूरी है।

कुछ बेवजूद बेमुरब्बत कुफ्र वालों से वास्ता हो गया मेरा।
खुद को तौला तो खुद ही पे शर्मसार हुआ।

बसंत फिर आकर चला गया 
तेरा ऋतुओं से भी वास्ता है !

वो लोग जो इश्क में रस्म ए रवादारी की बात करते है।
जो मोहब्बत की इब्तिदाई किताब को रद्दी की दुकाँ पे बेंच आये है। 

उन्होंने होश ओ हवास में मेरी मोहब्बत की तहोबाला कर दी।
हम होश खो कर भी इश्क की हर रस्म निभाते चले गए। 

इतनी मिलती है उस चिड़िया से सीरत उसकी।
जब भी मिलती है तो चोच लड़ाती है वो। 

तुझे पाना जो मेरा नसीब था

तेरा हिज्र भी तो अजीज है।

तू नहीं है जो मेरी हयात में
फिर भी तू दिल के करीब है

हर कहानी का सबब होता कहाँ है खुशनुमा।
एक दिन हम भी हँसे थे पहली दफा जब तुम मिली थी।

आँख में रहती नमीं थी जब हम दोनों साथ थे।
कम से कम अश्कों को अब थोड़ी मोहलत तो मिली है।

गम जुदाई का नहीं अब सालता होगा तुम्हें
रिश्ते दरकने से हमें बदले में ये राहत तो मिली है।

रात दिन की वो तड़प मिलना तेरा फिर दूर हो जाना।
मेरी जाँ चलो छोड़ों दिलों जाँ को अब फुर्सत तो मिली है।


भूख से बेहाल बच्चों की जरूरत है फकत कुछ रोटियाँ
इल्मदारी चुटकले और खिलौने ये सभी बेकार है।


पेट भूखा मगज़ सूखा ये हालात है हिन्दूस्तान के।
आप कहते हो की हम कायदे आज़म है इस कायनात के।


तेरा करम हुआ तो तुझे तेरी कसम दुनिया को बनाने वाले 
तेरी कायनात की खिदमत में इक दिन बड़ा नाम करूंगा.


मुद्दतें गुजर गयी उससे रूबरू हुए ।
मगर ख़्वाबों में हर ऱोज मिला करता हूँ।


मुसलसल चाह में तेरी दरिया सी रवानी है।
फकत बस चंद बांधों ने तेरी रफ़्तार कम की है।


प्रेम की कोई मुक़र्रर तारीख नहीं होती।
महसूस करो ये तो लम्हों का मामला है।


मोहब्बत दिलों में नहीं अब बाज़ार की चीज हो गयी।
इस मुसलसल ज़ज्बात की भी इक तारीख हो गयी।


मुस्तकिल रिश्तों की अब बुनियाद खो गयी।
इश्क की भी मुक़र्रर इक तारीख हो गयी।


दर ओ दीवार में उग आये है मुख्तलिफ़ दरख्त।
हम तो वीराने में है मगर चिड़ियों ने गुलज़ार कर रखा है घर।



कृष्ण कुमार मिश्र "कृष्ण"









1 comment:

ब्लॉग बुलेटिन said...


ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन अमीर गरीब... ब्लॉग-बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !