तलाश थी हमकों एक अशियानें की
आशियाँ जितने मिलें खौफ बारिश का था उनको
चाहत थी वफ़ा की बड़ी हमको
पर वेवाफाई का खौफ था उनको
हसरत उनको भी बड़ी थी मेरी मोहब्बत की
पर जगाह्सायी का खौफ था उनको
जमां कीतने रंग दीखाता है हमें
पर भटक जानें का खौफ है हमको
इसक होती है इबादत माशूक के बुत की
पर बुत के खो जाने का खौफ है हमको
दौर ए ज़माने को क्या कहूं कृष्ण
अब तो इस अदाम्खाने से खौफ है हमको
या फीर इस जमाने से खौफ है हमको
कृष्ण कुमार मीश्रा
Saturday, May 5, 2007
एक ग़ज़ल
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