१६-०१-१९९९
लोग कहते है की मोहब्बत में आबाद हुआ करते है
मैंने देखा है की बर्बादियों के भी समान हुआ करते है
यूं तो आशिकी में दिल को सुकून मिलाता है
लेकिन वहां दर्द व गम के सरे सामान हुआ करते है
मोहब्बत में पाकीज़गी का जिक्र सुना है हमने
मैंने देखा है की जिल्लत के भी सारे सामान हुआ करते है
इश्क की कार्गुज़ारिओं का बयाँ क्या करे कृष्ण
इश्क में हर लम्हा लोग कुर्बान हुआ करते है
दीवानों की जुबानी है माशूक बडे दिलकश होते हैं
ठीक कहता हूँ अगर उनके पास दिल तोडनें के भी औजार हुआ करते हैं
कृष्ण कुमार मिश्र
Krishna Kumar Mishra
77, Canal Road Shiv Colony Lakhimpur Kheri-262701
Uttar Pradesh
India
cellular-091-9451925997
Sunday, May 6, 2007
गजल
Saturday, May 5, 2007
एक ग़ज़ल
तलाश थी हमकों एक अशियानें की
आशियाँ जितने मिलें खौफ बारिश का था उनको
चाहत थी वफ़ा की बड़ी हमको
पर वेवाफाई का खौफ था उनको
हसरत उनको भी बड़ी थी मेरी मोहब्बत की
पर जगाह्सायी का खौफ था उनको
जमां कीतने रंग दीखाता है हमें
पर भटक जानें का खौफ है हमको
इसक होती है इबादत माशूक के बुत की
पर बुत के खो जाने का खौफ है हमको
दौर ए ज़माने को क्या कहूं कृष्ण
अब तो इस अदाम्खाने से खौफ है हमको
या फीर इस जमाने से खौफ है हमको
कृष्ण कुमार मीश्रा
मेरे भाव मेरी संबेद्नायें
तुझमें क्या हैं
जो पागल बनाता है मुझें
नित नई तरंग नित नया अध्याय
जो तुझसे है समबंधित!
तेरा ही गुणगान तेरा ही मान
क्यो भाता है मुझे
इतना अपनापन इतनी आत्मीयता
जो सिर्फ तुझसे है
कितना ससक्त है तेरा आकर्षण
जो हमेशा लुभाता है मुझे
तेरा ही स्मरण
चाहे हो उसमें कटुता या सरसता
हर वक्ता याद तेरी दीलाता है मुझे
क्या प्रेम है तुझसे या मात्र आकर्षण
या वासना का जाल
किशासे ग्रशित है मेरा मन
अस्मंजश में हूँ
फीर भी निश्छल हूँ
कयोंकी तुझ पर ही पूर्ण समर्पित हूँ
कृष्ण कुमार मीश्रा
७७, कैनाल रोड़ शीव कालोनी लखीमपुर खेरी
उत्तर प्रदेश
भारत