Saturday, June 14, 2014

उस चिड़िया के गीतों में...



वक्त के नसीब से
खुद को जोड़ता हुआ आदमी
तमन्नाओं का बोझ लिए फिरता है
आरजूएं थिरकती है उसके मन-आँगन में
ख्वाईशें पनपती है उसके ह्रदय में
उगते है तमाम बीज ख़्वाबों के?
बिना खाद के बगैर पानी के
वह सींचता है उन ख़्वाबों को सिर्फ मन की मुरादों से
कही ख़्वाब उगते है क्या
लेते है शक्ल क्या ऊँचे दरख़्त की
और क्या लगते है डालियों में फल
और अगर ऐसा होता है
तो जरूर चहचहाती होगी तमाम चिड़ियाँ
उस दरख़्त की डालियों पर
पर ख़्वाब तो ख़्वाब है
वो उगते भी है
दरख़्त भी बनते है
पर उन्हें सींचना होगा
पसीने से
देनी होगी म्हणत की खाद
सिर्फ परिकल्पनाओं से नहीं
न ही मुरादों से
कर्म की उंगली पकड़
अब बढेगा ये दरख़्त
और बनेगा
इक घोसला
उस चिड़िया का
जो सदियों से नीड़ की आस में है
फिर तब वक्त का नसीब
घुल जाएगा
उस चिड़िया के गीतों में

कृष्ण कुमार मिश्र(23/24 मई 2014)

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